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स्वराज इंडिया हरियाणा के वरिष्ठ नेता रवि भटनागर का लेख: नमाज़ पर फजीहत कैसी ?

स्वराज इंडिया हरियाणा के वरिष्ठ नेता रवि भटनागर का लेख: नमाज़ पर फजीहत कैसी ?

नमाज़ पर फजीहत कैसी ?

यह गुरुग्राम है. भारत का मिलेनियम शहर, जो भारत के नामी औद्योगिक शहरों में शुमार होता है, और दिल्ली की तर्ज़ पर मिनी इंडिया भी कहलाता है. देश भर से रोज़ी-रोटी की तलाश में आये लोगों के साथ बहुत से विदेशी भी यहाँ निवास करते हैं.

बीते कुछ दिनों में कुछ स्थानीय धार्मिक संगठनो द्वारा मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा खुले स्थानों पर पढी जा रही जुमे की नमाज़ पर एतराज जताया जा रहा है. ख़बरों के मुताबिक़ एक स्थान पर तो नारे बाज़ी कर के लोगों को नमाज़ पढने से रोका भी गया. हमेशा की तरह पुलिस और प्रशासन स्थिति को संभालने में नाकाम ही रहा. लेकिन अक्सर प्रशासन का रुख़ चुनी हुई सरकार के रवैये पर निर्भर करता है. पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम पर ग़ौर करें तो पता चलता है कि सरकार की तरफ से भी अंतर्विरोधी बयान सामने आए. हरियाणा के मुख्यमंत्री के बयान पर भी खासी दुविधा रही. ऐसे में, एक धार्मिक समुदाय का हौसला बढ़ जाना और दूसरे समुदाय का दहशत में आ जाना तो लाज़मी ही है.

गुरुग्राम में मुस्लिम आबादी लगभग बीस फ़ीसदी है, जब कि पूरे हरियाणा राज्य में इस समुदाय की संख्या केवल सात या आठ प्रतिशत ही है. ज़ाहिर है कि इनमें से ज़्यादातर मुस्लिम परिवार रोजगार के कारण ही देश के अन्य भागों से आए हुए हैं. ख़बरों के मुताबिक़ कुछ अतिवादी संगठनों और व्यक्तियों ने कहा है कि अगर पुलिस जुमे के दिन खुली जगहों पर नमाज़ होने से नहीं रोक पाई तो, वे स्वयं इसे रोकेंगे. एक दूसरी खबर के अनुसार, इन संगठनों की एक माँग यह भी है कि जुमे की नमाज़ केवल पाँच खुले स्थानों पर पढ़ी जाए, और ये स्थान भी स्थानीय मंदिरों से दो किलोमीटर की दूरी पर हों. फिलहाल तो स्थानीय प्रशासन ने यथास्थिति बनाए रखने का फैसला कर लिया है. संभवत: निकट भविष्य में कोई सौहार्दपूर्ण हल निकल पाए.

सदियों से साथ रह रहे विभिन्न समुदायों में न कभी मतभेद रहे, न ही मनभेद. छुटपुट विवाद तो परिवारों में भी होते रहते हैं. सब एक दूसरे के तीज-त्योहारों में उत्साहित ही होते रहे हैं. हाँ, यह भी सत्य है कि, हर समुदाय में एक तबका ऐसा भी रहा है, जो शुरू से ही अपने को अलग थलग या श्रेष्ठ मानता रहा है.

मात्र जुमे या ईद के दिन नमाज पढ़ने के जो डर या खतरे बता कर भ्रम पैदा किये जा रहे हैं, वे तार्किक नहीं लगते. इसलिए ऎसी घटनाओं पर सकारात्मक राजनीतिक हस्तक्षेप होना आवश्यक है. अगर मुद्दा विभिन्न ज़मीनों पर कब्जे का ही है, तो इसे धार्मिक संगठनों की नहीं, बल्कि ज़िला प्रशासन की चिंता का विषय होना चाहिए. साथ ही यह समझना भी ज़रूरी है कि नाजायज़ कब्जे़ कहीं भी बिना मिलीभगत के नहीं हो पाते.

 

ऐसे संजीदा मसलों पर सरकार और ज़िला प्रशासन को एक स्पष्ट और निर्णायक राय ले कर ही सामने आना चाहिए. इससे ही आम जनता में विश्वास पैदा होता है, और अराजकता पर लगाम भी लगती है. ये समझना, समझाना और जताना बहुत अहम है कि राज्य सरकार किसी भी राजनीतिक, धार्मिक या जातीय विचारधारा की पैरवी करती हुई दिखाई न दे.

यह ध्यान रखना और भी ज़रुरी है कि ऎसी चिंगारियाँ रोकी न जाएं, तो कई ऐसे औद्योगिक शहर इसकी चपेट में आ सकते हैं, जहाँ विभिन्न गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों से सभी धर्मों के लोग लोग काम की तलाश में आते हैं.

भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में, जातीय और धार्मिक अराजकताओं के लगातार चलते रहने से देश का सामूहिक विकास बाधित हुआ है. यह ज़रूरी है कि धर्म के मामले में विश्वास और आस्था अपने समुदायों के भीतर तक ही सीमित रहे. सभी जगहों पर बहुद्संख्यक और अल्पसंख्यक दोनों ही समुदाय के लोगों को यह आश्वस्त करते रहना भी ज़रुरी है कि उनके कार्यकलापों से आम जनता को कोई असुविधा न हो.

ऐसे मामलों में केंद्र सरकार की प्रत्यक्ष ज़िम्मेदारी है. केंद्र को राज्य सरकारों को भी स्पष्ट हिदायत देनी चाहिए ताकि ऐसे अवरोध पनपने ही न पाएं. अगर कोई संगठन या समूह, संविधान या प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना करने का प्रयत्न करते हैं, तो उनके ऊपर पूरी कानूनी प्रक्रिया के साथ सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. ज़रा सी ढील और लापरवाही, ऐसे मसलों को और भी संवेदनशील बना सकती है, और इसका खामियाज़ा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है.

सबसे अधिक विचारणीय बात यह है कि हमारी सामाजिक संरचना हमें छोटी छोटी बातों पर उत्तेजित होने की इज़ाज़त नहीं देती. इससे केवल कुछ स्वयंभू लोग राजनीतिक या धार्मिक गोलबन्दी के तात्कालिक लाभ ही ले सकते हैं. लेकिन ऎसी घटनाओं से आम जनता, शहर के माहौल, शिक्षा, यातायात, कामदार की रोज़ी- रोटी, स्वास्थ्य समेत विभिन्न ज़रूरी सेवाओं पर विपरीत असर पड़ता है. ऐसे में, सभी को ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर अपने फ़र्ज़ को निभाना होगा, यही पूरे समाज के हित में है.

Photo courtesy Public.Resource.Org


AUTHOR: RAVI BHATNAGAR
Senior Leader of Swaraj India, Haryana

After taking voluntary retirement from a nationalised bank, he became a senior consultant for a management consulting company, and is now engaged full time in social and political work.
ravikb08@gmail.com
The author’s views are personal.