Articles
स्वराज अभियान महाराष्ट्र का महासचिव, संजीव साने का लेख: समता या समरसता

स्वराज अभियान महाराष्ट्र का महासचिव, संजीव साने का लेख: समता या समरसता

समता या समरसता?

देश भर में 2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारी शुरू हो गई है. सत्ताधारी दल समाज के विभिन्न समूहों के बीच अपनी छवि सुधारने के लिए जोर-शोर से कार्यक्रम कर रहा है. विगत चार सालों में सरकार ने जो निर्णय लिये, वे समाज के हित में हैं, यह बात थोपने की कोशिश ज़ोरों पर है.

समाज के वंचित वर्गों के बीच सरकार की छवि सुधारने के लिए, खासकर यह दिखाने के लिये कि उनका दल दलित विरोधी नही है, दलितो के घर भोजन के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. इनका प्रचार भी जोरो से किया जा रहा है. लेकिन अब यह सच निकल कर आया है कि यह तो भाजपा का एक नाटक था. यहाँ रंगमंच तो दलित का घर था, लेकिन खाना बाहर से लाया गया. पानी और बर्तन भी बाहर से लाए गये. इसके फोटो भी सोशल मीडिया पर दिखाए जा रहे हैं. समरसता सिद्ध करने का भाजपा का यह ढोंग सबकी नज़रों में आया, इसके लिए मीडिया को धन्यवाद देना चाहिए.

इस बात पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख श्री मोहन भागवत ने भी नाराजगी जताई, और सार्वजनिक तौर पर कहा कि इससे समरसता नही आएगी. भाजपा नेताओं को तो दलित समाज के लोगों को खाने पर अपने घर बुलाना चाहिए. इतना ही नही, अष्टमी के दिन दलित समाज की महिलाओं को घर बुलाकर उनकी पूजा करनी चाहिये, और अपने घर की महिलांओंको दलित समाज के घरों में खाने पर भेजना चाहिये; इससे समरसता आएगी.

यह समझने की आवश्यकता है कि समता और समरसता में अंतर है. समता जीवन का एक मूल्य है. सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्र मे अधिकार के रूप मे समता का मूल्य प्रस्थापित करना, यह उद्देश्य है. यह ज़रूरी है कि समता के इस मूल्य का रोज़मर्रा के व्यवहार में पालन हो. किसी भी स्वरूप में विषमता का समर्थन नही होना चाहिये, भारत का संविधान भी ऎसी समता की बात करता है.

लेकिन समरसता का विचार इससे ठीक उलट है. समरसता का विचार और व्यवहार कुछ इस तरह है कि हम आपको अपने में सम्मिलित कर रहे हैं, या समा रहे हैं. इसके पीछे उपकार या एहसान की भावना है. यह इस बात को मान्यता देने जैसा है कि हम श्रेष्ठ या उच्च हैं और तुम कनिष्ठ या निचले स्थान पर हो. यह इस बात को मान्यता देना है कि जन्म से प्राप्त विषमता हमे मंजूर है या हम उसका समर्थन करते है.

इसी चर्चा मे एक खास तर्क दिया जाता है कि हाथ की सभी पाँचों अंगुलियाँ एक जैसी नहीं होतीं. इसका जवाब यह है कि हाथ की पाँचों अंगुलियाँ एक जैसी हों, इसका मतलब समता नहीं है. लेकिन पूरी दुनिया मे किसी भी धर्म, जाति या नस्ल की महिला और पुरुष सभी के हाथ में पांच अंगुलियाँ होती हैं, यह समता है. हर इन्सान का खून लाल है, हर इन्सान में सोच विचार करने की क्षमता है; यह सोच समता की सोच है. इसे नकारते हुये इन्सान को जन्म के आधार पर विभिन्न जातियों में बांटकर कनिष्ठ और अछूत मानकर समाज को विभाजित करना, यह विषमता है.

ऐसे विषमतापूर्ण समाज में एक मूल्य के रूप में व्यक्ति को उसके अधिकार मिलना, यह समता है. आप समाज की निचली पायदान पर हैं, फिर भी हम आपको अपने में सम्मिलित कर रहे हैं, इस तरह की एहसान की भावना से कार्य करने को ये लोग समरसता कहते हैं.

इसलिये समतावादी और समरसतावादी होना यह बिलकुल अलग और विरोधी बातें हैं, यह समझ लेना ज़रूरी है.

कथनी और करनी का यह अंतर हमे और पूरे देश को तब दिखा, जब उत्तरप्रदेश सरकार के मंत्रियों को बाहर का भोजन लाकर दलितों के घरों में खिलाया गया. जन्म के आधार पर समाज का विभाजन व्यक्ति और समूहों को कमजोर बनाता है. जाति से बंधा समाज अंदर से खोखला बनता है. ऐसे ही संख्या में कहीं कम एक समूह संख्या में बहुत विशाल जनसमूह पर केवल ज्ञान के बल पर अपनी सत्ता बनाये हुए हैं. लेकिन हताशा की बात यह है कि बहुसंख्यक होने के बावजूद लोगों ने मानसिक तौर पर इस जातिगत विषमता को स्वीकार किया है.

लेकिन जैसे-जैसे यह एहसास दलित, बहुजन समाज में आने लगा कि यह सब यह गलत है, और हमारे हित मे नहीं है; समाज जागने लगा. इसके बाद ही ‘समरसता’ और ‘वनवासी’ जैसी शब्दावली का उपयोग करके जन समूहों के बीच काम शुरू करके एक भ्रम निर्माण करने की शुरुआत हुई. किसी भी समाज में काम की शुरुआत शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के ज़रिए ही होती है. एक बार जब लोगों का भरोसा जम जाए, तब विचारों को थोपना शुरू होता है.यहाँ भी ऐसा ही हुआ.

सामाजिक जीवन में शब्दयोजना का अपना महत्व होता ही है. मुहावरे या शब्दों के माध्यम से विचार का संदेश दिया जाता है. सामाजिक- राजनैतिक कार्यकर्ता को हर बार यह बताने की ज़रुरत नहीं पड़ती कि उसकी वैचारिक धारणा क्या है. वह बोलते या लिखते समय जिस शब्दावली का उपयोग करता है, उसी से उसकी सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विचारधारा का पता चलता है. कार्यकर्ता को दूसरों की बात इसलिये ध्यान से सुननी या पढनी होती है, क्योंकि उसी से दूसरे का विचार का पता चलता है. इसलिये शब्दयोजना अपने साथी चुनने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है.

तो जो ‘समरसता’ कि बात करता है, वह ‘समता’ नही चाहता. वह भारतीय संविधान के मूल्य को नही मानता. इसीलिये संविधान को बदलने के पक्ष मे बोलता है. हमें साफ तौर पर यह बात अपने दिमाग में रखनी चाहिये.

और हम संविधान को मानते है इसलिये हम ‘समता’ के पक्ष मे है, ‘समरसता’ के नही.


AUTHOR: SANJEEV SANE 
State General Secretary of Swaraj Abhiyan, Maharashtra
He is an eminent political activist with decades of grass-roots work.

sanesanjiv@gmail.com

लेखक के विचार निजी हैं.