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स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजीव ध्यानी का लेख: विज्ञापनों की दुनिया, एयरटेल वाली लड़की और मोदी जी

विज्ञापनों की दुनिया, एयरटेल वाली लड़की और मोदी जी

किसी भी नए प्रोडक्ट के विज्ञापन में उसका सबसे मजबूत पक्ष ही सामने लाया जाता है। ये विज्ञापन सकारात्मक और आक्रामक होते हैं। लेकिन पुराने स्थापित प्रोडक्ट के मामले में कभी- कभी विज्ञापन रक्षात्मक भी हो जाते हैं। उदाहरण के लिए एक ऐसे साबुन को लीजिए, जिसे सेहत के लिए अच्छा बताकर खूब बेच लिया गया। लेकिन कुछ समय बाद वैसा ही एक अन्य सस्ता साबुन बाज़ार में आ जाए, और पुराने साबुन का बाज़ार टूटने लगे। ऐसे में पुराने साबुन वाली कम्पनी नया विज्ञापन निकालती है। विज्ञापन का पात्र यह कहते हुए नज़र आता है कि थोड़ी सी बचत के लिए सेहत से समझौता क्यों?

 

लेकिन कई बार ग्राहक को भरमाने के लिए प्रोडक्ट की कमजोरी को ही उसकी ताक़त बता कर पेश किया जाता है एयरटेल इसका अच्छा उदाहरण है। पिछले साल- दो साल में न जाने किस वजह से एयरटेल के नेटवर्क की हालत खराब हो गई।  नेटवर्क की शिकायत के अलावा डेटा की स्पीड भी बहुत कम हो गई। जब ग्राहक टूटने लगे तो एयरटेल का विज्ञापन बदल गया। एयरटेल वाली लड़की बताने लगी कि कि अमुक एजेंसी के मुताबिक़ हम भारत के सबसे तेज़ नेटवर्क हैं। ऐसा इसलिए हुआ कि ग्राहक कम से कम कुछ समय तक तो इस भरम में पड़ा रहे कि नेटवर्क तो अच्छा है, उसके ही फोन या सेटिंग या किसी और चीज़ में दिक्कत है। विज्ञापन को देखकर कुछ नए ग्राहक भी जुड़ ही जाएंगे.

लेकिन आज हम एयरटेल की नहीं, केंद्र की भाजपा सरकार के चार साल पूरे होने पर जारी किए गए विज्ञापनों की बात कर रहे हैं। ज़रा इस विज्ञापन को गौर से देखिए। सबका साथ, सबका विकास का नारा चुपके से बदल गया, और आपने गौर भी नहीं किया। नया नारा है- साफ़ नीयत, सही विकास। इस नारे का पहला हिस्सा रक्षात्मक है, और दूसरा हिस्सा कमजोरी को ताक़त बताकर माल बेचने की रणनीति।

भाजपा जैसी पार्टियों के नारे यूँ ही नहीं बदल जाते। उनके पीछे कुछ न कुछ गहरा होता है। इस मामले में भी है। भाजपा और मोदी जी का यह नया नारा दरअसल एक तरह की घबराहट की ओर इशारा करता है। नारे का पहला हिस्सा नीयत से जुड़ा है। मोदी जी और उनकी पार्टी जानती है कि वह अपने तमाम वायदों को अमल में लाने में बुरी तरह नाकाम रही है। ऐसा नहीं कि इससे पिछली सरकारें इनसे कुछ अलग या ज्यादा कर रही थीं, लेकिन बेलगाम बडबोलापन और बड़े सपने दिखाना आज उन्हें भारी पड़ रहा है। इसलिए अब वे नीयत जैसी अमूर्त चीज़ का सहारा ले रहे हैं। नए नारे में नीयत की बात दरअसल कुछ ख़ास न कर पाने की स्वीकारोक्ति है। इस नारे के बहाने मोदी जी यह कहना चाहते हैं कि भले ही वायदों के मुताबिक़ विकास नहीं हुआ, लेकिन हमारी नीयत तो साफ़ थी। नीयत के साथ दरअसल दिक्कत यह है कि आप इसे देख और माप नहीं सकते। मोदी जी इसी का लाभ उठाना चाहते हैं।

वैसे तो साम्प्रदायिकता के सवाल पर उनकी और उनकी पार्टी की नीयत का पता चलता है। लेकिन इस पर तो वे चाहते भी यही हैं कि उनकी नीयत उनके वोटरों को दिखती रहे. बल्कि वोटों की राजनीति के हिसाब से तो सबका साथ, सबका विकास जैसा नारा भाजपा को वैसे भी मुआफ़िक नहीं आता। शायद इसलिए भी इस नारे को नए नारे से बदल दिया गया हो।

बहरहाल, जहाँ नारे का पहला हिस्सा मोदी जी और भाजपा को बचाव की मुद्रा में दिखाता है, वहीं दूसरा हिस्सा बिलकुल एयरटेल के विज्ञापन जैसा लगता है। जैसे एयरटेल जानता है कि उनका नेटवर्क अच्छी कनेक्टिविटी और स्पीड नहीं दे रहा है, वैसे ही मोदी जी यह जानते हैं कि विकास के उनके मॉडल से न तो सही विकास नहीं हो रहा है, न ही सही लोगों का विकास हो रहा है, न ही सही तरीके से विकास हो रहा है। इसीलिए एयरटेल की तरह मोदी जी ने तथाकथित सही विकास की बात को आगे बढ़ाया है। इस विज्ञापन शैली के तहत एयरटेल वाली लड़की की तरह बार-बार मोदी जी और उनके संदेशवाहक बेहद आक्रामक तरीके से देश को यह समझाने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने सही विकास किया है। वे यह भी बताएंगे कि इससे पहले या तो विकास नहीं हुआ, या फिर सही नहीं हुआ। इसके तहत वे आपको बार-बार बताएंगे कि दिल्ली के पास सोलह लेन का एक्सप्रेस बनना दिल्ली वालों को पीने का पानी मिलने से ज्यादा ज़रूरी है, या देश में इंटरनेट का सस्ता होना झारखंड और उडीसा के बच्चों के भूख से मर जाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

वे एयरटेल वालों की बार-बार लगातार आपको यही सब बताएंगे। नए-नए उदाहरणों से, नए- नए तरीकों और संचार माध्यमों से। इस विज्ञापन में हर बार नए- नए चेहरे दिखाए जाएंगे, लेकिन हर बार एयरटेल वाली लड़की की तरह मुख्य जुमला मोदी जी के मुंह से ही सुनाई देगा। अब इस पर यकीन करना – न करना आप पर निर्भर करता है। मैंने तो बी एस एन एल छोड़कर एयरटेल लिया था, अब एयरटेल भी छोड़ रहा हूँ। वापस बी एस एन एल के पास जाने का कोई तुक नहीं, लिहाज़ा कोई तीसरा विकल्प तलाशना पड़ेगा।

Photo credit: Google open source 


लेखक: राजीव ध्यानी
स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
राजीव ध्यानी पेशे से संचार सलाहकार और प्रशिक्षक हैं. लम्बे समय तक उन्होंने यूनिसेफ, केयर तथा बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट जैसी संस्थाओं के साथ कार्य किया है. 

rajeevdhyani@gmail.com

लेखक के विचार निजी हैं.