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स्वराज अभियान महाराष्ट्र के महासचिव, संजीव साने का लेख: गैर भाजपा वाद कितना सही, कितना जरूरी?

स्वराज अभियान महाराष्ट्र के महासचिव, संजीव साने का लेख: गैर भाजपा वाद कितना सही, कितना जरूरी?

गैर भाजपा वाद कितना सही, कितना जरूरी?

2019 के चुनावी गठजोड़ की शुरुआत कर्नाटक से हो गई है. भाजपा विरोधी शक्तियाँ अपने अंकगणित के हिसाब से देश की मौजूदा जनविरोधी और संविधान विरोधी सरकार को उखाड़ फेंकने की मंशा रखती हैं, जो कि स्वाभाविक भी है.

इसी अंकगणित को सामने रखकर डॉ. राम मनोहर लोहिया ने वर्ष 1961 से गैर कांग्रेस वाद का विचार जनता के सामने रखना शुरू किया था. उन्होंने बताया कि गैर कांग्रेसी शक्तियाँ अगर रणनीति के रूप में चुनावी तालमेल करें, तो देश से कांग्रेस की सरकार हट सकती है. लेकिन उनके विचार भाषणों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने कांग्रेस सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ अनेक कार्यक्रम भी रखे. इनमें किसान की फसल के दाम तय करने, बाजारों को दलाल मुक्त करके महँगाई कम करने, बेरोजगारी ख़त्म करने, महिलाओं को सुरक्षा देने, सस्ते अनाज की दुकान हर मोहल्ले में शुरू करने, जनता को सस्ता इलाज मुहैया कराने, समान शिक्षा और मातृभाषा में शिक्षा देने, अंग्रेजी हटाकर देश की भाषाओं को प्रतिष्ठा देने, समाज मे पिछड़ों को विशेष अवसर देने, हर धर्म के लोगों को अपने अधिकारों के साथ सुरक्षा प्रदान करने, समाज मे बढ़ती आर्थिक और सामाजिक विषमता को खत्म करने जैसे मुद्दे शामिल थे. उन्होंने इन मुद्दों के इर्द-गिर्द संघर्ष करते हुए काँग्रेस विरोधी शक्ति के निर्माण का आवाहन किया.

 

इस सोची-समझी रणनीति के साथ चुनाव में गठबंधन करना, यह उनकी भूमिका थी. इसी आधार पर देश में अलग- अलग कांग्रेस विरोधी दलों ने अपने कार्यक्रम चलाए, अपना जनाधार तैयार किया, और मिलकर चुनाव लड़े. इससे कांग्रेस विरोधी मत इकठ्ठा हुए, और उत्तर भारत के नौ राज्यों में संविद यानी संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनीं. आज़ादी के बाद से यह कांग्रेस की सबसे बड़ी हार थी.

लेकिन इसी साल लोहिया जी का देहांत हो गया. डॉ. लोहिया के जाने के बाद उनके अनुयायियों ने इस रणनीति को सिद्धांत बना दिया, और देशमे गैर कांग्रेसवाद के नाम पर राजनीति की शुरुआत हुई. इसका सबसे बड़ा राजनीतिक फायदा उस समय के जनसंघ को मिला. उसके दो कारण थे. पहला यह कि यह एक कम जनाधार वाला, लेकिन निष्ठावान स्वयंसेवको का दल था. दूसरा यह कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा तैयार किए गए कार्यकर्ताओं ने अपनी पारंपरिक भूमिका छोड़कर 61 से 67 के बीच के सालों में देश की जाति व्यवस्था को समझा, और मध्यम व पिछडी ,अछूत, घुमक्कड़ जातियों तथा आदिवासियों में बढ़ती राजनीतिक चेतना को जानते-समझते हुए उन्हें हिंदुत्व की बड़ी धारा में संगठित करने के प्रयास किए. उन्होंने अपनी सारी ताक़त इस काम में लगाने का निर्णय किया. 67 से 77 तक संघ और उनकी अनेकों संस्थाएँ यह काम करती रहीं. एक रणनीति के अनुसार तबसे जनसंघ ने हर आंदोलन व संघर्ष में अपनी हिस्सेदारी बढाई. इतिहास इसका गवाह है कि कैसे किसान और मजदूर आंदोलनों में वे लगातार शरीक थे. 74 की रेल हड़ताल हो, महँगाई के खिलाफ आंदोलन हो, जयप्रकाशजी का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो, या बाद में तानाशाही के खिलाफ हुआ आंदोलन हो, हर जगह उनकी उपस्थिति दिखाई दी.

यह तो सभी जानते हैं कि किस प्रकार जयप्रकाश जी के आग्रह तथा पहल पर विपक्षी एकता मजबूत करने के लिए कई दलों का विलय करके एक जनता पार्टी का गठन किया गया. अपनी रणनीति के तहत जनसंघ इसमें विलीन तो हो गया, लेकिन उसने अपने असली एजेंडा को नहीं छोड़ा. समाजवादी और काँग्रेस के पुराने लोगों ने बिना किसी रणनीति के इस अपील को भावुकता (जो उनकी हमेशा से कमजोरी रही है) के साथ लिया, और अपने राजनीतिक अस्त्रों यानी दलों को जनता पार्टी में विलीन कर दिया. इसे पुनर्स्थापित करने का कार्य आज तक नहीं हो पाया.

लेकिन इसके ठीक उलट, जब सही वक्त आया, तो जनता पार्टी में रहकर भी अपना अस्तित्व बनाए हुए जनसंघ ने फिर से जनसंघ नाम नहीं अपनाया, बल्कि जनता पार्टी के आगे भारतीय शब्द जोड़कर भाजपा की स्थापना की. एक रणनीति के उन्होंने तहत एक तरफ तो ‘गांधीवादी समाजवाद’ को स्वीकार किया, दूरी ओर अपनी अलग-अलग संस्थाओं के माध्यम से हिन्दू मानस को टटोलने के प्रयास भी शुरू कर दिए. इसकी शुरुआत “गंगाजल यात्रा” से हूई. अंततःगांधीवादी समाजवाद को बिना कोई घोषणा किये छोड़ दिया गया, और खुले रूप में हिंदुत्व का नारा दिया गया. 92 के बाद भाजपा की सरकार आई तो, सरकार बनाए रखने के लिए भाजपा ने राम मंदिर का मुद्दा एनडीए के एजेंडा से बाहर रखा. आखिरकार आडवाणी समेत तमाम नेताओं को दरकिनार कर भाजपा ने नरेंद्र मोदी को आगे किया, और 2014 में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई.

आशय यह है कि राजनीति में रणनीति का प्रयोग करना ही पड़ता है. अगर आप अपने बूते किसी सत्ता को हटाकर अपनी सरकार स्थापित नहीं बना पाते, तो उस वक्त रणनीति के रूप में (सिद्धान्त के रूप में नहीं) एक नहीं, अनेक विकल्प खोजने पड़ते हैं.

Photo credit:   of International Business Times


AUTHOR: SANJEEV SANE 
State General Secretary of Swaraj Abhiyan, Maharashtra
He is an eminent political activist with decades of grass-roots work.

sanesanjiv@gmail.com

लेखक के विचार निजी हैं.