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स्वराज इंडिया हरियाणा के वरिष्ठ नेता रवि भटनागर का लेख: जनतंत्र की कथा, व्यथा और विकल्प

स्वराज इंडिया हरियाणा के वरिष्ठ नेता रवि भटनागर का लेख: जनतंत्र की कथा, व्यथा और विकल्प

जनतंत्र की कथा, व्यथा और विकल्प

आज देश की आम जनता और सामाजिक अवस्था, दोनों ही व्यथित हैं। जनता की चाहतें ही नहीं, अब तो मूलभूत ज़रूरतें भी आसमान छू रही हैं. सरकार की हर कोशिश मुसीबतों को और बढाती हुई लगती है. चार साल पहले जनता ने कुछ बेहतर हो जाने की उम्मीदें पाली थीं। अच्छे दिनों के वायदों पर ज्यादा विश्वास तो नहीं था, पर सीधी सादी जनता फिर भी सपने देखने की भूल कर ही बैठी।

वर्तमान सरकार शुरू से ही सीधा- सीधा सोचने की कोशिशों से परहेज़ करती हुई लगी। कुछ विलक्षण और अलग करने की कोशिश में कई साधारण से मसलों को भी इतना उलझाया गया कि बाद में चीज़ों को संभालना ही मुश्किल होता चला गया। ज़्यादातर योजनाएँ काग़ज़ों से उठ-उठ कर धराशायी हो गईं, बाक़ी के नतीजे भी काफी़ भ्रामक रहे। बडे़-बड़े कार्यक्रमों में धन झोंक कर सरकार जनता के जिस वर्ग के कायाकल्प करने के प्रयत्न में लगी है, उनकी तो कायाही नष्ट होने के कगार पर पहुंच रही हैं।

देश के अवाम की मूलभूत और आवश्यक प्राथमिकताओं को नकारते हुए केंद्र सरकार अपने दिवा-स्वप्नों को पूरा करने की कोशिश में, पहले हो चुके विकास को भी पीछे धकेल रही है।

 

एक तरफ गुजरात में लौह पुरुष की सबसे विशालकाय मूर्ति खड़ी करने की ललक है, और दूसरी तरफ एक छोटी सी मोनोरेल चलाने की सौदागरी। इन सबके बीच, छोटे किसानों की फसल के वाजिब दाम मिलें न मिलें, सही वक्त पर ख़रीद हो न हो, मज़दूर बेरोजगारी के कगार पर हों, तो ऐसे में विकास देखें कहाँ? कर्ज़ की मार और अनेकों असुविधाओं के चलते हजारों किसान- मज़दूरों की आत्म हत्याओं की खबरें खबर बनने से पहले ही दफ्न हो जाती हैं।

कभी कभी तो ऐसा आभास होने लगता है कि कानून की अंधा बनाये रखने वाली काली पट्टी वहाँ से सरक कर सरकार की आँखों पर जा चिपकी है। सरकार विकास को किसके चश्मे से और कैसे कैसे देख रही है और क्या दिखाना चाह रही है, यह सरकार स्वयं भी नहीं समझ पाई है। हर कदम और फैसले को तमाशे की तरह पेश कर स्वयं ही उत्साहित होते रहना इस सरकार की आदत बन गया है। सरकार के सारे नेता और सरकारी अमला भाव विभोर हो कर फैसलों पर अमल करने के करतब में जुट जाता है।

अभी कुछ दिन पहले ही पूरे गाजे-बाजे के साथ एलान किया गया कि देश के सारे गाँवों मैं बिजली पहुँचा दी गई है। मीडिया भी दिन भर इस ऐतिहासिक खबर को दोहराता रहा। लेकिन दो दिन में ही अलग-अलग राज्यों के अंधेरे गाँवो की खबरें आने लगीं। इस बात को बारीकी से समझा तो पाया कि अगर किसी गाँव के दस प्रतिशत स्थानों पर भी बिजली पहुंचा दी जाये, तो मान लिया जा रहा है कि पूरा गाँव रौशन हो गया है।

अगर यही मानदंड सभी सेवाओं, सुविधाओं व अन्य क्षेत्रों में लागू मान लिया जाये, तब तो वर्तमान सरकार के आने से पहले ही भारत समृद्ध और विकसित हो चुका था। यह दस प्रतिशत का जुगाड़ तो हमारे देश को सबसे समृद्ध देश बना डालेगा, और किसी को खबर भी नहीं होगी। सरकार अगर मात्र खुद के गढ़े गए तथ्यों पर अपनी पीठ थपथपाने का उपक्रम करती रहेगी, तो ऐक दिन चारों खाने चित्त गिरने के हालात पैदा हो सकते हैं। यह सब जल्द ही होता हुआ दिख भी रहा है । कुल मिलाकर भुगतना तो जनता को ही है, और उसे इसके लिये तैयार भी रहना होगा।

इस बात का और विस्तृत आंकलन किया जाए, तो पता चलेगा कि पिछले लगभग तीस वर्षों में अलग-अलग कारणों से देश के राजनीतिक दलों के स्वभाव व चरित्र में बहुत बदलाव आये हैं। सभी दल अपने अपने संविधानों को दर किनार कर अलग तरह की राजनीति कर रहे हैं। धर्मांधता और जातिगत विषमता क इन राजनीतिक दलों ने अपनी ढाल बना लिया है। इन्हीं के इर्द-गिर्द सारी राजनीति सिमटती दिखाई देती है।

यह अकाट्य सत्य है कि आज के परिप्रेक्ष्य में विकल्प तलाशने का उद्यम और उद्देश्य बहुत अहम हो गया है। सत्ता सुख भोगने की आदत पाले हुऐ सभी राजनीतिक दल सत्ता में बने रहने या उसे वापस हथियाने की कोशिश में किसी भी हद तक गिरते दिख रहे हैं। स्वराज अभियान का जन्म ऎसी ही विकट परिस्थितियों में हुआ है। इसकी राजनीतिक भुजा स्वराज इंडिया ने समस्याओं के सुलझे, स्वच्छ और परिपक्व राजनीतिक हल समाज के सामने रखने प्रारंभ किए हैं। प्रयत्न यही है कि दल हर मसले पर जनता के साथ सीधे संवाद कर समस्याओं के हल तलाशे। दल का नेतृत्व यह मानता है कि हर देश की विशेष परिस्थितियों के हल वहाँ की जनता और वहाँ के शुभचिंतक निवासी ही सुझा सकते हैं।

इस देश की कोई भी समस्या ऎसी नहीं है, जिसका हल ढूंढा न जा सके। सही वक्त पर, सही समाधान ढूंढने के ईमानदार प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है। जब राजनीतिक दल और उनका नेतृत्व सोच की सीमाओं या अपनी पुरानी हो चुकी युक्तियों को छोड़ नहीं पाते, तभी सारे प्रयास निरर्थक होते हैं। अब सब कुछ नये सिरे से सोचने -विचारने की ज़रुरत है, जिसकी पहल एक सुलझा हुआ नेतृत्व और इस देश की युवा पीढ़ी ही कर सकती है। खुशी इस बात की है कि, ‘स्वराज अभियान’ इन दोनों मोर्चों पर अपनी सफलता दर्ज करता हुआ आगे बढ़ रहा है, और अपनी राजनीतिक भुजा स्वराज इंडिया को भी मज़बूत बना रहा है।

Photo credit: Election Tamasha


AUTHOR: RAVI BHATNAGAR
Senior Leader of Swaraj India, Haryana

After taking voluntary retirement from a nationalised bank, he became a senior consultant for a management consulting company, and is now engaged full time in social and political work.
ravikb08@gmail.com

The author’s views are personal.