Articles
म्यांमार के रोहिंग्या संकट पर स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजीव ध्यानी के लम्बे लेख की दूसरी किश्त

म्यांमार के रोहिंग्या संकट पर स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजीव ध्यानी के लम्बे लेख की दूसरी किश्त

बेघर और बेचारे लोग 2

म्यांमार के रोहिंग्या संकट पर राजीव ध्यानी के लम्बे लेख की दूसरी किश्त

माना जाता है कि आठवीं शताब्दी में मौजूदा बंगाल के चटगांव इलाके से बहुत से लोग बगल के अराकान (अब रखाइन) इलाके में जाकर बस गए. इनमें से लगभग सभी लोग हिन्दू थे, क्योंकि बंगाल के इस इलाके में इस्लाम इसके कहीं बाद में आया. अरब व्यापारियों, तुर्क आक्रमणकारियों और ईरान से आए सूफियों के ज़रिए. इसके बाद इस तरफ के लोगों के ज़रिये इस्लाम उस तरफ गया. आठवीं शताब्दी के बाद भी इस ओर के चट्टगइयाँ (चटगाँव की) बांग्ला बोलने वाले हिन्दू और फिर बाद में मुसलमान उस तरफ जाते गए. यह क्रम हाल के दशकों तक चलता रहा. धीरे-धीरे थोड़े से हिन्दुओं को छोड़कर लगभग सभी लोग मुसलमान हो गए. लगभग सभी लोग सुन्नी हैं. इनमें से बहुत से लोग बीते कुछ दशकों में इस्लाम के वहाबी विचार के ज्यादा करीब आए हैं. ये खुद को रोहिंग्या कहना पसंद करते हैं. ये अलग बात है कि 1948 में अपनी आज़ादी के बाद से ही बर्मा की सरकारों ने इस शब्द को मान्यता नहीं दी है. उनके हिसाब से रोहिंग्या जैसी कोई चीज़ नहीं होती और ये लोग बंगाली घुसपैठिये हैं.

दरअसल, सदियों से एक साथ रहने के बावजूद रोहिंग्या और अराकानी बौद्ध समुदाय कभी एक दूसरे के साथ घुलमिल नहीं पाए. उनके बीच पारस्परिक द्वेष बना ही रहा. अक्सर यह हिंसा का रूप भी ले लेता था. इसके पीछे मज़हब ही इकलौता कारण नहीं था. भाषा और संस्कृति की असमानता भी थी, व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता भी, और दूसरे सामाजिक- राजनैतिक कारण भी.

विधिवत रूप से बर्मा के एक राजा ने सन 1784 में अराकान को बर्मा में मिलाया. इसके बाद अराकानी बौद्धों और बर्मा के दूसरे बौद्ध बहुल इलाकों के बीच संपर्क भी बढे और अराकानी बौद्धों की ताक़त भी. अराकानी बौद्धों ने अपनी इस ताक़त को समझा भी, और अपने प्रभाव वाले इलाकों में रोहिंग्याओं पर जब-तब उसका परीक्षण भी किया. वैसे अपने इलाके में दूसरा पक्ष भी कुछ कम नहीं था.

अंग्रेजों के कब्जे में बर्मा

1825 के आसपास बर्मा के शासकों और अंग्रेजों के बीच लडाइयां शुरु हो गईं. तीन बड़े युद्ध हुए, पहले युद्ध में ही बर्मा पराजित हुआ. बर्मा ने समझौते के तौर पर 1826 में अराकान प्रदेश अंग्रेजों को सौंप दिया, और इस तरह अराकान पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया. इसके बाद 60 साल की अवधि में हुए कई युद्धों के बाद आखिरकार 1886 में अंग्रेजों ने बर्मा को को पूरी तरह से कब्जे में ले लिया. बर्मा ब्रिटिश भारत से जुड़ गया, और 1937 तक जुड़ा रहा. 1937 में अंग्रेजों ने अराकान समेत बर्मा का प्रशासन ब्रिटिश भारत से अलग कर दिया. इस तरह 111 साल बाद अराकान प्रांत भारतीय प्रशासन से अलग हो गया.

भारत की तरह बर्मा के लोग भी शुरुआत से ही अंग्रेजों के राज का विरोध कर रहे थे. अंगेजों के खिलाफ छोटे- छोटे विद्रोह भड़कते रहते थे. 1935 के आसपास रंगून यूनिवर्सिटी में छात्र यूनियन की पत्रिका में ब्रिटिश राज के खिलाफ कुछ लेख लिखकर कुछ कम उम्र के लड़के सामने आए, और अपनी नेतृत्व क्षमता के बूते जल्द ही छात्रों के सर्वमान्य नेता बन गए. रंगून यूनिवर्सिटी बर्मा की राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र थी, सो जल्द ही पूरे बर्मा में इस समूह की पहचान बन गई. आज बर्मा यानी म्यांमार की राज्य प्रमुख आंग सान सू क्यी के पिता आंग सान इसके सबसे बड़े नेताओं में थे. आंग सान और उनके साथियों ने कई पार्टियों और संगठनों का गठबंधन बनाया और उसके नेता बन गए. बाद में हमारे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तरह आंग सान और उनके साथी भी जापान के संपर्क में आए, और उन्हीं की तरह जापान की मदद से आज़ाद बर्मा फ़ौज बनाकर दूसरे विश्व युद्ध में जापान की मदद की.

अपनों के खिलाफ अंग्रेजों के साथ

जब समूचा बर्मा या यूँ कहें कि बर्मीज़ बौद्ध जापान की मदद से अंग्रेजों से लड़ने के लिए सेनाएं बना रहे थे, तब रोहिंग्या अंग्रेजों के साथ थे. आपसी समझ यह थी, कि अगर बर्मा पर अंग्रेजी कब्ज़ा बना रहता है, तो अंग्रेज अराकान के रोहिंग्या बहुल इलाके को अलग देश के तौर पर आज़ाद कर देंगे. दिल्ली में मौजूद अंग्रेजी सेना ने रोहिंग्या नौजवानों को.

images by Tasnim News Agency


लेखक: राजीव ध्यानी
स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
राजीव ध्यानी पेशे से संचार सलाहकार और प्रशिक्षक हैं. लम्बे समय तक उन्होंने यूनिसेफ, केयर तथा बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट जैसी संस्थाओं के साथ कार्य किया है. 

rajeevdhyani@gmail.com

लेखक के विचार निजी हैं.