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स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजीव ध्यानी का लेख: बेघर और बेचारे लोग

स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजीव ध्यानी का लेख: बेघर और बेचारे लोग

बेघर और बेचारे लोग

म्यांमार के रोहिंग्या संकट पर राजीव ध्यानी के लम्बे लेख की पहली किश्त  

12- 13 सितम्बर 17 को, जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना रोहिंग्या शिविरों को देखने पहुंची तो उन्हें देखते ही म्यांमार की सीमा के पास स्थित बालुखाली-कुटुपलांग के शिविरों में एक साथ सैकड़ों महिलाओं के आर्त्रनाद गूँज उठे. जब माँओं ने बिलखते हुए बताना शुरू किया कि किस तरह उनकी गोद से छीनकर बच्चों को आग में झोंक दिया गया, तो वहाँ मौजूद फौज के जवानों तक को रुलाई आ गई.

शेख हसीना की आँखों से आँसू छलक पड़े, जब एक महिला ने शेख हसीना को बताया कि कैसे म्यांमार के फौजियों और स्थानीय लोगों ने उसके अलावा लगभग तीस अन्य महिलाओं और लड़कियों को घरों से खींचकर एक जगह पर इकठ्ठा किया, और उनके साथ बर्बरता से सामूहिक बलात्कार किया.

 

 

बंगाल में माँ शब्द का चलन भी बहुत है, और माँ को मान्यता भी. लोग छोटी बच्चियों को भी माँ कहकर संबोधित करते हैं. बंगबंधु शेख मुजीब की बेटी भी तो इन लाखों रोहिंग्याओं के लिए माँ ही बन गई थी. कुटुपलांग के उन शरणार्थी शिविरों में अपनी आपबीती सुनाते हुए बार-बार चीत्कार के साथ महिलाएँ और बच्चियाँ ‘ओ माँ’ कहकर प्रधानमंत्री से लिपट जा रही थीं. इतने दुःख के बाद कोई अपना जो मिला था उन्हें. माँ की ही तरह उनके सर को सहलाती, उन्हें भींचकर सीने से लगाती शेख हसीना अपने आंसुओं को रोक नहीं पा रही थीं. बंगाल की खाड़ी के उस उदास किनारे पर मानो दुःख का समुद्र ही उमड़ पड़ा था.

हर तरफ बेइंतिहा रुलाई के बीच उस दिन शेख हसीना के लिए किसी ने कहा ‘मानवता की माँ’. शेख मुजीब की बेटी हसीना अब मानवता की माँ हो गई थी. आज बांग्लादेश में शेख हसीना की तस्वीर वाले बड़े होर्डिंग्स और पोस्टरों पर यही लिखा दिख रहा है- Sheikh Hasina: The Mother of Humanity.

वैसे यह दीगर बात है कि इस घटना के सिर्फ दो हफ्ते पहले तक यही रोहिंग्या शेख हसीना सरकार के लिए गले की हड्डी बने हुए थे.

फिर से शरणार्थी 

यूँ तो बर्मा यानी म्यांमार में रोहिंग्याओं के खिलाफ हिंसा और दमन का यह दौर कई दशकों से जारी है, लेकिन अगस्त 2017 जैसे मंज़र इतिहास की आँखों के सामने से भी शायद कम ही गुज़रे हों.

25 अगस्त 17 को म्यांमार में जब सेना द्वारा बड़े पैमाने पर नरसंहार और आगज़नी शुरू हुई तो बहुत तेज़ी के साथ लोग जितना हाथ में आया, उसे समेटकर बांग्लादेश सीमा की ओर भागे. नाफ नाम की एक बड़ी नदी काफी बड़े इलाके में म्यांमार और बांग्लादेश की सरहद बनाती है. बहुत से रोहिंग्याओं के लिए इसे पार कर के बांग्लादेश की सीमा में घुसना ही सबसे सरल रास्ता था. नाफ के अलावा भी उन्हें रास्ते में कई छोटी- बड़ी नदियों, जलधाराओं, समुद्र के बैक-वाटर्स और बरसात के पानी से जूझना था. कहीं – कही नाविकों ने भाड़े के लालच में ज्यादा लोगों को भर लिया, और पूरी नाव ही नाफ नदी या समुद्र में डूब गईं. काफी दिनों तक हर दूसरे- तीसरे दिन नावों के डूब जाने से लोगों के मरने की ख़बरें आ रही हैं.

ये नावें भी बड़ी नदियों को पार करने के लिए ही थीं, छोटे नदी- नालों और बरसात के पानी से भरे जंगली रास्तों को बिना नाव के ही तय करना था. बच्चे- बूढ़े और बीमार लोगों को घरवाले जैसे- तैसे लाद- फांद कर लाए. इनमें से कुछ बीच में ही दम तोड़ बैठे,उनकी कब्रें वहीं बनीं, और काफिले आगे बढ़ते गए.

फिर से अपने ही आए काम
देखते ही देखते हज़ारों की संख्या में रोहिंग्या बांग्लादेश की सीमा पर इकठ्ठा हो गए. शुरू में कुछ दिन तक बांग्लादेश सरकार को समझ में नहीं आया कि वह क्या करे. सीमा पर इकठ्ठा रोहिंग्या लोगों को रोकने में बांग्लादेश के बॉर्डर गार्ड्स को दिक्कत आने लगी थी. उधर सीमा पर रोहिंग्याओं की संख्या बढ़ रही थी, इधर बांग्लादेश के भीतर जनता और मीडिया ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय व स्थानीय एन जी ओ ने भी लगातार जोर लगाया. तब कहीं जाकर यह ऐलान हुआ कि बांग्लादेश रोहिंग्याओं को शरण देगा. 25 अगस्त को शुरू हुए नरसंहार के करीब करीब बीस दिन बाद भरी आँखों से प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने ऐलान किया कि अगर बांग्लादेश अपने 16 करोड़ नागरिकों के लिए अनाज जुटा सकता है तो है, तो इन 7-8 लाख लोगों का पेट भी भरेगा. इस मौके पर शेख हसीना के साथ उनकी बहंन शेख रेहाना भी थीं.

जब शेख हसीना यह कह रही थीं, तब शायद दोनों बहनों की आँखों के सामने बयालीस साल पहले की वह रात ज़रूर रही होगी, जब उन्हीं की सेना के कुछ लोगों ने उनके पिता (बांग्लादेश के राष्ट्रपति बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान), माँ और तीन छोटे भाइयों समेत संयुक्त परिवार के बीसेक लोगोंकी हत्या कर दी थे. इनमें उनका 10 साल का सबसे छोटा भाई शेख रासेल भी शामिल था. दोनों बहनें उस समय बांग्लादेश के बाहर थीं, इसलिए बच गईं. इसके बाद करीब छः साल तक दोनों बहनों को भारत और यूरोप में निर्वासित जीवन बिताना पडा था.

बहरहाल, बांग्लादेश ने जैसे ही अपनी सीमाएं खोलीं, शरणार्थियों का तांता लग गया. यह लेख लिखे जाने तक करीब साढ़े छः लाख रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में पहुँच चुके हैं. इसमें अस्सी के दशक से लेकर  अगस्त 17 के बीच बांग्लादेश आए दो लाख से अधिक शरणार्थी शामिल नहीं हैं. उन्हें जोड़कर तो सरकारी आंकडा साढ़े आठ लाख और गैर सरकारी अनुमान नौ-साढ़े नौ लाख तक पहुँच चुका है.

……….अगली किश्त में जारी….

images by Tasnim News Agency.


लेखक: राजीव ध्यानी
स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
राजीव ध्यानी पेशे से संचार सलाहकार और प्रशिक्षक हैं. लम्बे समय तक उन्होंने यूनिसेफ, केयर तथा बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट जैसी संस्थाओं के साथ कार्य किया है. 

rajeevdhyani@gmail.com

लेखक के विचार निजी हैं.