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स्वराज अभियान महाराष्ट्र के महासचिव, संजीव साने का लेख: क्या हम हिन्दुओं के हित में काम नही करतें?

स्वराज अभियान महाराष्ट्र के महासचिव, संजीव साने का लेख: क्या हम हिन्दुओं के हित में काम नही करतें?

क्या हम हिन्दुओं के हित में काम नही करतें?

देश में विभिन्न विचारों के साथ काम करने वाले अनेक समूह हैं। ज़ाहिर है कि अपने व्यक्तिगत हित से आगे निकलकर बड़े समूह के लिए काम करने का सीधा संबंध विचार से होता है। कोई भी कार्य बिना विचार के नहीं होता, इसलिए उसे स्पष्ट तरीके से लोगों को बताना जरूरी होता है।

 

समाजवाद के समर्थन में और विषमता के खिलाफ काम करने वाले समूह जो खुद को सेक्युलर कहते हैं, वे सभी जाति, वर्ग तथा धर्म के व्यक्तियों के हित को ध्यान में रखकर अपना कार्यक्रम घोषित करते हैं। ऐसे समूहों को आजकल स्यूडो सेक्युलर कह कर संबोधित किया जाता है। यह शब्द पहली बार लालकृष्ण आडवाणी और दिवंगत प्रमोद महाजन ने राम मंदिर के लिए निकाली गई यात्रा के दौरान किया। इसके तहत जो लोग या संगठन घोषित रूप में खुद को सेक्युलर मानते हैं, उनको टारगेट किया गया। “सेक्युलर समूह मुसलमानों और ईसाइयों का तुष्टिकरण करते हैं और ऐसा करने वाले हिंदू-हित के विरोध में काम करते हैं”, यह संदेश इस शब्द का उपयोग करके दिया गया। इसका फायदा भी भाजपा को मिला और समाज में सेक्युलर समूहों के बारे में गलतफहमी कायम करने की उनकी रणनीति कामयाब हो गई। वास्तव में इसका सही जवाब देने की जरूरत को हम हमेशा टालते रहे हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि सेक्युलर समूहों में अधिक संख्या तो हिंदुओं की ही है। लेकिन भाजपा के जवाब में क्या तर्क दिया जाए, इस बात पर समझ और राय नही बन पाई। जो लोग यह समझ बना भी पाए, उनमें भी शायद इस बात को कहने का साहस नहीं था। अगर किसी ने यह साहस किया भी तो उसे हिन्दू कैम्प में धकेल दिया गया। जो भी हो, इस बहस को चलाने से हम कतराते रहे कि हम भी तो हिन्दुओं के हित की ही बात करते आए हैं और आगे भी करते रहेंगे।

हिन्दू हित माने क्या?

इस देश में सबसे ज्यादा यानी करीब 85 प्रतिशत लोग हिन्दू धर्म को मानने वाले हैं। हिन्दू समाज की रचना जाति व्यवस्था से जुड़ी है, जिसमें किसी व्यक्ति की समाज में स्थिति और अधिकार जन्म के आधार पर तय होते हैं। एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र में दखल देने की इजाजत नहीं होती। इसी कारण रोटी और बेटी का सम्बन्ध अपनी ही जाति में करना अनिवार्य होता है। हजारों साल से चली आ रही इस व्यवस्था से बहुत थोड़े से लोगों के हितों की रक्षा होती थी। अन्य की संख्या ज्यादा होने के बावजूद उनके साथ अन्याय किया जाता रहा। लेकिन लोगों को यह एहसास नहीं था कि यह अन्याय है, विषमता है। जानकारी न होने के कारण ये समूह चुपचाप इस स्थिति को सहते रहे और अपना भाग्य मानकर इस व्यवस्था का समर्थन करते रहे।

इसी 85 प्रतिशत हिन्दू समाज को जगाने का काम गौतम बुद्ध , महावीर, बसवेश्वर जैसे संतों ने किया। फिर पेरियार, फुले, आम्बेडकर, गाँधी आदि महान विचारको ने विचारों का तर्क देकर समाज को संगठित किया और सरकार को इन 85 प्रतिशत लोगों के हितों की रक्षा करने के लिए कानून बनाने और ज़रूरी फैसले लेने के लिए बाध्य किया। इससे समाज के अंदर मत और मन परिवर्तन की शुरुआत हुई। भारतीय संविधान ने इस देश के हर नागरिक को एक वोट का अधिकार दिया। साथ ही उन्हें बोलने, लिखने,संचार करने, शिक्षा लेने आदि का अधिकार दिया, जो पहले सिर्फ ब्राह्मण पुरुषों का अधिकार था। ब्राह्मण महिला को भी ये अधिकार प्राप्त नहीं थे। इसके साथ ही सम्पत्ति कमाने और रखने तथा व्यापार का अधिकार दिया, जो पहले वैश्य समाज के पास ही था। सुरक्षा करने का क्षत्रियों का काम अब सभी का हो गया लेकिन सेवा करने का काम अभी भी चौथे वर्ण के पास ही है। उसे बदलने की मानसिकता धीरे- धीरे बदल रही है। अस्पृश्यता कानून तो हट गया है, लेकिन अन्याय-अत्याचार आज भी कायम है।

85 प्रतिशत हिन्दू समाज में इस पिछड़े और वंचित समूह की जनसंख्या लगभग 90 प्रतिशत है। इसी 90 प्रतिशत पिछड़े समाज की हम बात करते हैं। उनके हितों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हमारे जैसे राजनीतिक समूह देश में कार्यरत हैं, तो वे हिन्दू विरोधी कैसे हो जाते हैं? इस अन्याय ग्रस्त समूह के साथ अन्य अल्पसंख्यक समाज (भाषा और धर्म के स्तर पर) के अधिकार की बात करना भी जायज है। यही फर्क है हममें और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में।

असलियत में समाज की इस बहुधर्मी, बहुभाषिक और बहु- सांस्कृतिक धरोहर को संघ नही मानता। उसे एक तरफा बनाना, यानी एक ईश्वर- एक संस्कृति का निर्माण , यही उनका असली काम है। इसी के तहत आदिवासी समाज को वनवासी कहा जाता है और निसर्ग की पूजा करने वाले समाज पर गणेशजी को थोपा जाता है। संघ ने अपने मकसद को हासिल करने के लिए राष्ट्रीय मुस्लिम मोर्चा भी बनाया है और बोध गया में अखिल भारतीय भिख्खु संघ भी स्थापित किया है।

इसीलिए हिन्दू समाज को अधिक सम्पन्न बनाने का काम संघ ने नहीं, बल्कि देश की बहु-सांस्कृतिक संस्कृति ने किया है, जो सेक्युलर भारत का आधार है। इसलिए हम इस भ्रम को दूर करें कि हम सेक्युलर विचार करने वाले हिन्दू हित की बात नहीं करते। उल्टा हम सभी ने इस व्यवस्था से संघर्ष कर समाज के पिछड़े वर्गों के लिए जो कुछ हासिल किया है, उससे सबसे ज्यादा फायदा हिन्दू समाज का ही हुआ है। फिर वह संघर्ष न्यूनतम वेतन का हो, महँगाई भत्ते का हो, दिन में 8 घंटे काम करने का हो, भविष्य निर्वाह भत्ते का हो, सभी को स्वास्थ्य, शिक्षा और घर के अधिकार का हो; पानी का न्यायपूर्ण बँटवारा हो , आर.टी.आई कानून हो, किसान को अपनी फसल के पूरे दाम मिलने का हो, शहर और गाँव की बढ़ती खाई मिटाने का हो या आर्थिक, सामाजिक गैर-बराबरी मिटाने का हो। यह समझना और समझाना होगा कि महिलाओं के अधिकारों और उन्हें 33 फ़ीसदी आरक्षित जगह दिलाने की बात हो या पिछड़ी-जाति जनजाति समेत मंडल कमीशन की सिफारिश लागू करने की बात हो, इन सबके लिए देश की सेक्युलर ताक़तें ही सबसे ज्यादा संघर्ष करती रही हैं, संघ परिवार नहीं।

इसलिए हमें इस धारणा को दूर करने का प्रयास करना चाहिए कि हम हिन्दू विरोधी हैं। असलियत में हम तो सबसे ज्यादा हिन्दू हितैषी हैं।

Photo credit: Scroll


AUTHOR: SANJEEV SANE 
State General Secretary of Swaraj Abhiyan, Maharashtra
He is an eminent political activist with decades of grass-roots work.

sanesanjiv@gmail.com

लेखक के विचार निजी हैं.