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प्रशांत भूषण के मामले में अगर सुनवाई ‘ईमानदारी’ और ‘इंसाफ’ के जज्बे से हुई तो मिलेंगे जरूरी सवालों के जवाब


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प्रशांत भूषण के विरुद्ध अदालत की अवमानना के बहुप्रतीक्षित मामले में सुनवाई अगले हफ्ते शुरु हो रही है तो जरुरी है कि हम इस मामले को लेकर गलत सवाल ना पूछें. गलत सवाल ये कि क्या प्रशांत भूषण को उनके ट्वीट और इससे पहले कही गई अपनी बातों के लिए दंडित किया जाना चाहिए? सवाल गलत पूछेंगे तो जवाब भी गलत ही मिलेंगे, भले ही जवाब हमदर्दी भरे और उचित प्रतीत हों.

बीते एक हफ्ते में मामले पर मीडिया ने अपना मुंह खोला है. कई पूर्व जज, नागरिक तथा कार्यकर्ताओं (जिनमें आपका ये खाकसार भी शामिल है) ने प्रशांत भूषण के पक्ष में आवाज उठायी है. प्रशांत भूषण के पक्ष में जो बातें कही गई हैं उनमें ज्यादातर का जोर अवमानना के कानून के पुराने-धुराने और अप्रासंगिक होने, सहिष्णुता के मूल्य, अदालत के उदारमना होने की जरुरत या फिर इस बात पर केंद्रित हैं कि प्रशांतभूषण ने जनसेवा-भावी वकील के रुप में देश की क्या और कितनी सेवा की है.

प्रशांत भूषण के पक्ष में जो बातें कही गई हैं वो बेशक मूल्यवान हैं लेकिन यहां ये बात मानकर चलें कि बहस का मुद्दा प्रशांत भूषण नहीं हैं. मामला ये नहीं है कि क्या प्रशांत भूषण ने अपनी बात कहने में किसी मर्यादा का उल्लंघन किया है. मामला तो दरअसल ये है कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत में सर्वोच्च आसन पर बैठे कुछ पदाधिकारियों के हाथों निहायत बुनियादी किस्म के संवैधानिक, कानूनी और नैतिक मान-मूल्यों को चोट पहुंची है.

अब ऐसा तो है नहीं कि प्रशांत भूषण ने भारत के मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ कोई बात कही और ऐसा कहते हुए उनके मन में भाव मौज-मजा लेने का रहा हो और उन्होंने ये मान रखा हो कि कहा तो कहा, कहने से क्या बिगड़ेगा मेरा! बीते तीन दशक से प्रशांत भूषण लगातार जनहित के मुद्दे पर बोलते रहे हैं, उन्होंने अपनी बात पर्याप्त जिम्मेदारी के भाव से कही है और ऐसा कहते हुए उन्होंने पेशेवर तथा निजी जिन्दगी के जोखिम उठाये हैं. उनकी मंशा ये रही है कि भारत के शीर्षस्थ अदालत में सुधार की जरुरत पर लोगों का ध्यान जाये. अवमानना के मामले से एक अवसर मिला है कि प्रशांत भूषण ने जो मसले उठाये हैं, उनपर चर्चा हो.

जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना के 11 साल पुराने मामले को फिर से उठाने का तय किया है तो अदालत का ये फैसला स्वागतयोग्य है. मैं मामले में होने जा रही सुनवाई पर पूरी उम्मीद से नजर लगाये हुए हूं क्योंकि सुनवाई से उस गंभीर मसले का उत्तर मिलना है जो प्रशांत भूषण ने तहलका के अपने मूल इंटरव्यू में उठाया था. तब उन्होंने संवैधानिक पदों पर बैठे शीर्ष अधिकारियों को लेकर कोई चमकीली-चुटीली और चलताऊ बात नहीं कही थी. जब साल 2009 में अवमानना के मामले में पहली बार अदालती प्रक्रिया शुरु हुई तो प्रशांत भूषण ने अपने आरोपों के साथ अदालत को तीन हलफनामे सौंपे थे जिनमें आरोपों की पुष्टि में दस्तावेजी प्रमाण दिये गये थे.

हलफनामे में साल 1991 से 2010 के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद पर विराजमान रहे 18 जजों में से आठ का नाम लिया गया था और उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार(जरुरी नहीं कि ये मामले घूसखोरी या फिर रुपयों के लेन-देन से जुड़े हों) के विशिष्ट मामलों का उल्लेख किया गया था और इन मामलों के पक्ष में यथासंभव दस्तावेजी साक्ष्य संलग्न किये गये थे. जरा कल्पना कीजिए कि कितनी मेहनत लगी होगी, कितना साहस करना पड़ा होगा इतने ऊंचे पद पर बैठे अधिकारियों के खिलाफ ऐसे सवाल पूछने और इन सवालों के पक्ष में भरपूर ब्यौरे के साथ साक्ष्य जुटाने में.

बड़े सवाल

लेकिन अदालत कभी इन साक्ष्यों की परीक्षा के लिए बैठी ही नहीं. मामले में आखिरी सुनवाई आठ साल पहले हुई थी और तब से मामले पर एकदम से चुप्पी है. इस चुप्पी से धारणा बनती है कि अदालत के लिए इन साक्ष्यों की तौल-परख कर पाना बहुत भारी साबित हुआ है. माननीय जजों ने चाहे जिन कारणों से भी अवमानना के मामले पर सुनवाई का फैसला किया हो लेकिन हमें सुप्रीम कोर्ट का निश्चय ही शुक्रगुजार होना चाहिए जो उसने प्रशांत भूषण के असहज करते सवालों से टकराने और उसपर फैसला देने का तय किया है. अवमानना के मामले में सुप्रीम कोर्ट में होने जा रही सुनवाई एक ऐतिहासिक अवसर है जब लंबे समय से उपेक्षित रहे कुछ अहम मसलों पर सार्वजनिक रुप से बहस का मौका होगा.

प्रशांत भूषण के ट्वीट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए अदालत ने जो मामला हाथ में लिया है, वो भी स्वागतयोग्य है. ये बात ठीक है कि मुख्य न्यायाधीश एस.ए.बोबडे से संबंधित ‘मोटरसाइकिल ट्वीट’ के विरुद्ध एक लचर सी याचिका को संज्ञान में लेना अदालत की प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं है. फिर भी, इससे एक महत्वपूर्ण बात उभरकर सामने आयी है कि अदालत का कामकाज इतने लंबे समय तक बंद रहा, देश में तो अनलॉक की प्रक्रिया लगातार जारी है लेकिन नागरिकों की पहुंच अभीतक इंसाफ के मंदिर तक दूभर बनी हुई है.

अदालत ने ‘पिछले चार मुख्य न्यायाधीशों’ की ‘लोकतंत्र’ के ‘विनाश’ में निभायी गई भूमिका से संबंधित ट्वीट को संज्ञान में लिया है तो वो विशेष रुप से स्वागतयोग्य कहलाएगा. बीते कुछ साल सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में बड़े उथल-पुथल भरे साबित हुए हैं जब सत्तासीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भ्रष्टाचार और मुख्य न्यायाधीश के पद पर बैठे अधिकारी व्यक्ति के विरुद्ध यौन उत्पीड़न का मामला उछला, अदालत के वरिष्ठ जजों ने इस बात को लेकर प्रेस-कान्फ्रेंस बुलायी कि मुख्य न्यायाधीश अपने ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ सरीखे अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हैं. ये मामले देश की शीर्ष अदालत के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं कहे जायेंगे. शीर्ष पांत के ज्यादातर टिप्पणीकारों, अखबारों तथा कई पूर्व जजों ने बड़े मानीखेज सवाल पूछे हैं कि इन तमाम मामलों के देश में लोकतंत्र के भविष्य के लिहाज से आखिर क्या अर्थ निकलते हैं.

प्रशांत भूषण के ट्वीट से अदालत का ध्यान इन बातों पर गया है. सो, हमें ट्वीट से उठते सवालों पर गौर करना चाहिए ना कि ट्वीट करने वाले व्यक्ति पर. क्या सुप्रीम कोर्ट से संविधान की संरक्षा की अपनी जिम्मेवारी में कहीं चूक हुई है ? क्या मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के अभिभावकत्व की अपनी भूमिका का सही-सही निर्वहन कर पाये हैं?

इस सिलसिले की आखिरी बात ये कि हमें अवमानना के मामले में होने जा रही सुनवाई से उम्मीद रखनी चाहिए कि उससे कानून और लोकतंत्र से जुड़े एक बुनियादी सवाल का उत्तर मिलेगा. सवाल ये कि सच्चाई अगर अदालत के लिए असहज करने वाली हो तो क्या ऐसी सच्चाई को अदालत की अवमानना माना जायेगा ? क्या अदालत के बारे में कोई साक्ष्य-पुष्ट विधिवत दर्ज राय, जिसकी परीक्षा होनी शेष है, अदालत की अवमानना के तुल्य समझ ली जाये? क्या अदालत के आंगन के अनैतिक आचार के खिलाफ बोलने से पहले किसी व्यक्ति को अपने हर आरोप की सच्चाई साबित करके कदम बढ़ाना चाहिए ? और, इसी सिलसिले का सवाल है कि क्या किसी व्यक्ति को अवमानना के लिए दंडित करने से पहले अदालत को ये साबित करना होता है कि उस व्यक्ति ने जो कुछ भी कहा है वो सब गलत है?

‘ईमानदारी’ और ‘इंसाफ’

मुझे सचमुच उम्मीद है कि अदालत एक निष्पक्ष, तटस्थ और पूर्णव्यापी सुनवाई का मन बनायेगी और लंबे समय से अपने उत्तर की अपेक्षा में अधर में लटके सवालों को जो फिलहाल एकदम से सरगर्म हो उठे हैं, उनकी अंतिम नियति तक पहुंचायेगी. मेरे जानते, ऐसी सुनवाई की तीन शर्ते हैं. एक तो ऐसी सुनवाई खुली अदालत में होनी चाहिए, चंद लोगों की पहुंच वाले कंप्यूटर स्क्रीन तक

उसे सीमित रखकर चलना ठीक नहीं. दूसरे, साक्ष्यों को प्रस्तुत करने और उनकी जांच के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए, जैसा कि निचली अदालतों में सुनवाई में होता है. तीसरी बात, सुनवाई पांच वरिष्ठतम जजों(या भावी मुख्य न्यायाधीशों) की पीठ करे, इसमें मौजूदा मुख्य न्यायाधीश को शामिल ना किया जाये (क्योंकि ट्वीट में उनका नाम है) तथा जस्टिस अरुण मिश्र को भी ऐसी सुनवाई में शामिल ना किया जाये क्योंकि प्रशांत भूषण के पास ये मानने के पर्याप्त कारण है कि जस्टिस अरुण मिश्र के होते उनके साथ इंसाफ नहीं हो सकता.

अगर सुनवाई इन तीन शर्तों को पूरा करते हुए होती है और निष्पक्ष सुनवाई के बाद अदालत इस फैसले पर पहुंचती है कि प्रशांतभूषण ने अपने शपथपत्र में जो कुछ कहा है वो झूठ है, वे शपथपत्र में दर्ज बातें के झूठ होने के बारे में पहले से जानते थे और उन्होंने झूठ को इसलिए फैलाया ताकि कोर्ट की प्रतिष्ठा की हानि हो, तो ही प्रशांत भूषण को दंड दिया जाये. और, जो ऐसी बात साबित होकर नहीं निकलती तो फिर क्या अदालत बहु-प्रतीक्षित आत्म-परीक्षण के काम में लगेगी और अपने भीतर दूरगामी संस्थानिक सुधार के बाबत सोचेगी? अगर ऐसा नहीं होता तो प्रशांत भूषण पर चला अदालत की अवमानना का मामला एडीएम जबलपुर जैसा ही एक अन्य मामला साबित होगा जो भारतीय अदालत की आत्मा को आने वाले लंबे वक्त तक कचोटेगा.


(योगेंद्र यादव राजनीतिक दल, स्वराज इंडिया के अध्यक्ष हैं. यह लेख उनका निजी विचार है)

Published in : The Print

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