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वाजपेयी-नेहरू प्रकरण याद है? इसलिए चीन मुद्दे पर मोदी को आरोपों की सूली पर टांगने से कांग्रेस को बचना चाहिए


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माना जाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा मोदी सरकार की तरकश का सबसे चोखा तीर है. ऐसे में भारत और चीन के बीच सीमा-विवाद का नया प्रकरण विपक्ष के लिए अचके में हाथ लगे ‘मत चूको चौहान’ सरीखे अवसर की तरह है और विपक्ष नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर ही धकियाकर एक किनारे कर सकता है.

सो, कांग्रेस अगर अवसर ना गंवाने के लालच में फंसती है और 1962 की हार पर जो कुछ अटल बिहारी वाजपेयी ने जवाहरलाल नेहरू को कहा था वैसा ही कुछ नरेंद्र मोदी की सरकार को कहने के लिए आतुर दिखे तो इसके लिए उसे क्योंकर दोष देना? फिर भी, अच्छा यही होगा कि विपक्ष ऐसे लालच में फंसने से बाज आये. राष्ट्रहित हमेशा पार्टी हित से ऊंचा और बड़ा होता है. प्रधानमंत्री को आरोपों की सूली पर टांगना ठीक नहीं, चाहे वे ऐसे नरम बरताव के हकदार हों या नहीं क्योंकि अगर ऐसा ना किया गया तो दरअसल चोट हम सब पर साझे में पड़ेगी.

मैं भारत-चीन संबंधों या फिर रणनीतिक मामलों का कोई विशेषज्ञ नहीं. एक सौभाग्य ये भी है कि इस मसले पर साफ नज़र और बिना किसी खटके के पूरे तफ्सील से लिखी गई दास्तानव्याख्या और विश्लेषण सार्वजनिक जनपद में मौजूद हैं.

सो, आप सहज ही जान सकते हैं कि मसले की जमीनी सच्चाइयां क्या हैं और दोनों देशों के आपसी रिश्ते के एतबार से इसके दूरगामी परिणाम क्या निकलने वाले हैं. वक्त का तकाजा है कि हम विशेषज्ञों की राय से सीख लें और किसी सियासी फैसले पर पहुंचे. ये समय अभी के लम्हे के पार जाकर सोचने का है और इसके पहले कि स्थिति हाथ से निकल जाये, अपनी दलगत लाभ-हानि के विचार से ऊपर उठकर देश के दीर्घकालिक हित में सोचने का भी वक्त है.

मामले को लेकर उभरने वाली बड़ी तस्वीर तो बिल्कुल स्पष्ट है. बीते कुछ दशकों के एतबार से देखें तो भारत को अभी चीन की ओर से होने वाले सबसे गंभीर अतिक्रमण का सामना करना पड़ रहा है. यह गर्मी के दिनों में भारतीय फौज और चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी के बीच सालहा-साल से होते चले आ रहे किसी गतिरोध की तरह नहीं. ना ही इसे हम किसी स्थान-विशेष तक सीमित और उस स्थान-विशेष के हालात के कारण पैदा गहन गतिरोध के ही रुप में देख सकते हैं जैसा कि 2017 में डोकलाम में देखने में आया था. यह एकदम से सोचा-समझा अतिक्रमण है और अलग-अलग सैन्य क्षेत्रों मे पड़ने वाले कई इलाकों में किया गया है.

एक आकलन के मुताबिक दस हजार चीनी सैनिक हमारी तरफ की वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के भीतर घुस आये हैं जबकि ये वैसे इलाके हैं जहां भारतीय सेना रोजमर्रा की गश्त करती थी और चीन भी मानता आया था कि ये इलाके भारत की सीमा के भीतर पड़ते हैं. चीन का इरादा ये दिखाने का है कि उसकी सेना के पांव जहां तक आ पहुंचे हैं वहां से वो टस से मस नहीं होने वाली. चीनी सेना अपने हिस्से वाले सीमा-क्षेत्र के भीतर खंदक खोद रही है, शिविर लगा रही है, सड़क बना रही है और गाड़ियों से आवाजाही कर रही है. इस तरह चीनी सेना ने अपने इर्द-गिर्द एक सुरक्षित घेरा तैयार कर लिया है. यह जोर-जबर्दस्ती कुछेक अहम इलाकों में वास्तविक नियंत्रण रेखा को बदल डालने की सोची-समझी चाल है.

हमें ठीक-ठीक ये नहीं पता कि चीन ऐसा कर रहा है तो आखिर क्यों. कारण बताने की कौन कहे चीन इस बार ये तक नहीं स्वीकार रहा कि उसकी सेना ने अतिक्रमण किया है जबकि डोकलाम में उसने अतिक्रमण की बात मानी थी. लेकिन ये बात हम तय मानकर चल सकते हैं कि चीन ने ऐसा कदम किसी बेख्याली में नहीं उठाया, ना ही उसका ये कदम किसी उकसावे की काट में आयी किसी चलताऊ प्रतिक्रिया की ही तरह है. चीन का यह कदम उसकी किसी दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है. इसे चीन की विस्तारवादी नीति का एक और साक्ष्य मानकर चलना निठल्ला चिंतन ही कहलाएगा.

क्या ये माना जाए कि चीन अपने इस अतिक्रमण के जरिये भारत को एक चेतावनी दे रहा है कि तुम वास्तविक नियंत्रण रेखा के अपने हिस्से में बुनियादी ढांचे का विकास करने और चीन की बराबरी में आने की हिमाकत करने से बाज आओ? क्या चीन जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख के बदले हुए मानचित्र को देखते हुए अपनी प्रतिक्रिया साध रहा है? या फिर, चीन का संदेश इससे कहीं बड़ा है, वो भारत को इस अतिक्रमण के जरिये चेतावनी देना चाहता है कि अमेरिका के चीन-विरोध गठबंधन में शामिल होने से बाज आओ? या फिर, ये माना जाये कि चीन के मौजूदा अतिक्रमण के पीछे इनमें से हर कारण कुछ ना कुछ मौजूद है? शायद हम ये बात कभी ना जान पायें क्योंकि चीनी राजसत्ता अपनी मंशा का इजहार करने में यकीन नहीं करती. तो फिर रास्ता यही बचता है कि हम चीन की बातों पर ना जाकर उसकी करतूतों पर नज़र रखें और चीन की करतूतों को देखकर चिन्ता जागती है.

राष्ट्रीय सुरक्षा के एतबार से भारत को दीर्घकालिक खतरा पाकिस्तान या फिर बैर ठाने बैठे किसी अन्य पड़ोसी से नहीं है. महाकाय आर्थिक और सैन्य ताकत वाली एक चीनी राजसत्ता ही है जिसकी हमें चिंता करनी चाहिए क्योंकि चीन दूर की सोचकर योजना बनाने की सलाहियत रखता है.

ये बात भी साफ है कि भारत की तरफ से कदम उठाने में झोल-झाल बरता गया. अब ऐसा किसकी वजह से हुआ, स्थानीय कमांडर को जिम्मेदार माना जाये या फिर ऊंचे ओहदेदारों को, ये तो तयशुदा तौर पर नहीं कह सकते लेकिन दिख रहा है कि मामले को समय रहते पहचानने-पकड़ने और फिर चीनी अतिक्रमण के प्रतिकार में कदम उठाने में देरी हुई.

सैन्य मामलों में पहली चाल चलने वाले को बढ़त होती है और आज की तारीख में चीनी सेना को यही बढ़त हासिल है. हालांकि हिंदुस्तानी फौज ने चीन की चाल की काट के तौर पर अपनी मौजूदगी बढ़ायी है लेकिन ये भी दिख रहा है कि चीनी सेना के पैर मजबूती से जमे हैं और उसे जमीन पर पैर जमाये रखने के लिए बेहतर बुनियादी ढांचा भी हासिल है.

बात को खोलकर कहें तो भारत की सेना के पास अपनी बंदूकों के दहाने खोलते हुए सीधे-सीधे लड़ाई में उतर जाने के अतिरिक्त शायद ही ऐसा कोई विकल्प बचा है जिसके सहारे वो चीनी सेना को कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर सके लेकिन बंदूकों वाली लड़ाई में उतरना नुकसान का सौदा साबित हो सकता है. चीन को जमीनी बढ़त हासिल है, साथ ही उसे अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत को लेकर भी इत्मीनान है. जाहिर है, चीन कोई पाकिस्तान तो है नहीं कि आप बालाकोट जैसा सर्जिकल ऑपरेशन चलाने की सोचें. तो, रास्ता यही बचता है कि बातचीत की जाये, समझाने-बुझाने का तरीका अपनाया जाये लेकिन चीन इसके लिए रजामंद नहीं दिखता. चीन पर कूटनीतिक दबाव भी काम नहीं करने वाला. और, ये भी जाहिर है कि हमारी सरकार ने दोस्ताना रुख रखने वाले तमाम पड़ोसी देशों को, जिसमें श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल जैसे परंपरागत मित्र देश भी शामिल हैं, नाराज़ कर रखा है.

अज्ञानता और अहंकार को आपस में फेंटकर बनायी गई समझ हमारे विदेश-संबंधों पर असर डाल रही है.

इन कठोर सच्चाइयों का सामना करते हुए सरकार के हाथ-पांव ढीले पड़ रहे हैं. चाहे चीनी अतिक्रमण के मामले में झोल-झाल जिस सिरे पर हुई हो लेकिन इस झोल के पैदा होने की जिम्मेवारी किसी ना किसी की तो बनती ही है. ये जिम्मेवारी चाहे प्रधानमंत्री कार्यालय की ना हो तो भी रक्षा मंत्री को तो इसका जिम्मेवार मानना ही पड़ेगा.

भारतीय सेना सच्चाई को नकारकर चल रही है, वो मानकर चल रही है कि हम जिसे वास्तविक नियंत्रण रेखा समझते हैं उसके भीतर चीनी सेना घुस ही नहीं पायी है. किसी शिकारी चीते की तरह ‘चीड़ देंगे-फाड़ देंगे’ के तेवर में बोलने वाली राष्ट्रवादी जमात अब होठ सिलाये बैठी है. बस एक अहमकाना सा आह्वान सामने आया है कि चीन में बनी चीजों का बहिष्कार कीजिए. वास्तविक नियंत्रण रेखा का अभी स्पष्ट निर्धारण नहीं हुआ है, ऐसा कहकर राजनाथ सिंह ने भारत का पक्ष और ज्यादा कमजोर किया है. प्रधानमंत्री ने मामले पर पत्थर के बुत जैसी चुप्पी साध रखी है और वही कुछ करता दिख रहे हैं जो संकट के ऐसे वक्त में वे करते आये हैं- संकटमोचक के रुप में डोभाल को बुलाओ कि वे इस गड़बड़झाले से उबार लें. प्रधानमंत्री का सौभाग्य कहिए कि मीडिया ने अभी तक उनसे कठिन सवाल पूछना शुरू नहीं किया. लेकिन ऐसा देर तक तो नहीं चल सकता. कोई ना कोई असहज करता ये सवाल पूछेगा ही कि चीनी अतिक्रमण को भारत चुपचाप सहते क्यों जा रहा है?

अरुणाचल प्रदेश में हुई हार के तुरंत बाद 9 नवंबर 1962 को राज्य सभा में बोलते हुए बिल्कुल यही आरोप अटल बिहारी वाजपेयी ने जवाहरलाल नेहरू पर लगाया था. कांग्रेस अब उस आरोप को उन्हीं शब्दों में लौटा सकती है. राहुल गांधी ये मांग कर ही चुके हैं कि सरकार सीमा के हालात के बारे में स्पष्ट जानकारी दे. राहुल गांधी ने निशाना वहां साधा है जहां बड़े जतन से गढ़ी गई प्रधानमंत्री की छवि को सबसे तेज झटका लगेगा.

चीन के साथ सीमा-विवाद का मौजूदा प्रकरण प्रधानमंत्री की निजी नाकामी का भी संकेत है, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ की गई झूला-डिप्लोमेसी की रस्सियां एकबारगी टूटती दिख रही हैं. प्रधानमंत्री के मित्र राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसी बीच जले पर नमक छिड़कने के अंदाज में मध्यस्थता करने की बात कह दी है और ये भी प्रधानमंत्री को निश्चित ही अच्छा नहीं लगा होगा.

फिर भी, मुझे लगता है कि यही वो लम्हा है जब विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने से बचना चाहिए. हम अभी स्वास्थ्य के मोर्चे पर आपातकाल की सी स्थिति से गुजर रहे हैं. अगर राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर सरकार को दोषी मानकर उसपर हमलावर हुआ जाये तो फिर सरकार स्वास्थ्य के मोर्चे पर स्थिति में सुधार के लिए जो थोड़ा-बहुत कर रही है, उससे अपना मुंह मोड़ सकती है.

हम अभी आजाद भारत में किसी एक घटना से पैदा सबसे बड़े आर्थिक संकट के दौर से भी गुजर रहे हैं. अगर सैन्य-मुठभेड़ की सोचें या फिर ऐसे मुठभेड़ की तैयारियों में ही लग जायें तो फिर हमारी अर्थव्यवस्था उस हाल को पहुंच जायेगी कि उसे उठाते ना बनेगा. सबसे बड़ी बात ये कि ऐसी दशा में अगर विपक्ष हमलावर होता है तो फिर सरकार आधे-अधूरे मन से कोई कदम उठाने को मजबूर होगी और ऐसा करना हमारे राष्ट्रीय हित को चोट पहुंचायेगा. तरीका बस यही है कि हम सरकार को समय दें ताकि वो चीन की इस सोची-समझी दीर्घकालिक योजना के जवाब में खूब सोच-समझकर अपने चुने हुए समय पर कदम उठाये.

राष्ट्रीय हित जैसे शब्द का हाल के सालों में बड़ा अनर्थ हुआ है और यही वो वक्त है जब राष्ट्रीय हित जैसे शब्द के असली अर्थ को समझकर हम उसकी हिफाजत में उतरें. प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे राष्ट्रहित के प्रति अपनी निष्ठा का इजहार करते हुए विपक्ष के प्रमुख नेताओं को अपने विश्वास में लें. और, विपक्ष को चाहिए कि संकट की इस घड़ी में वो प्रधानमंत्री को आरोपों की सूली पर टांगने से बचे और इस तरह राष्ट्रहित के प्रति अपनी निष्ठा का परिचय दे.

(योगेंद्र यादव राजनीतिक दल, स्वराज इंडिया के अध्यक्ष हैं. यह लेख उनका निजी विचार है)


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