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स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष योगेंद्र यादव का लेख: राहुल की आय योजना पर पूछे जाएं सही सवाल


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राहुल गांधी की न्यूनतम आय योजना या तो देश के इतिहास में गरीबी उन्मूलन की सबसे बड़ी योजना है या फिर गरीबों के साथ सबसे बड़ा छलावा। इन दोनों में से यह क्या है, इस सवाल पर देशभर में बहस होनी चाहिए। हर गरीब परिवार को हर महीना नकद 6000 रुपए देने के इस चुनावी वादे की कड़ाई से जांच होनी चाहिए। इसका गणित सार्वजनिक होना चाहिए। चूंकि अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि कांग्रेस का वादा है क्या, इसलिए बहस होनी चाहिए। क्या पहले के बीपीएल कार्ड की तरह अब देश के सबसे गरीब पांच करोड़ परिवारों को चुना जाएगा और हर परिवार के बैंक खाते में सीधे हर महीने 6000 रुपए डाल दिए जाएंगे? या हर परिवार की 12,000 रुपए से जितनी कम आमदनी होगी उतनी ही भरपाई की जाएगी? इस जवाब से पता लगेगा कि इस योजना पर कितना खर्च होगा, सीधा 3.6 लाख करोड़ रुपए या उससे कम?

अभी से जांच इसलिए जरूरी है, क्योंकि देश दूसरी बार धोखा नहीं खा सकता। पिछली बार नरेंद्र मोदी ने हर बैंक खाते में 15 लाख रुपए डालने की बात कही, लेकिन किसी ने नहीं पूछा कि पैसा कहां से आएगा। उन्होंने हर साल दो करोड़ रोजगार देने का वादा किया। न कोई हिसाब दिया न किसी ने मांगा। पिछले तीन साल से किसान की आय दोगुनी करने की बात चला रहे हैं। किसी ने नहीं पूछा या बताया कि यह कैसे होगा? आज तक सरकार ने बताया नहीं कि पिछले तीन साल में किसान की आय कितनी बढ़ी है? बहस सार्थक तभी हो सकती है अगर हम कुछ फिजूल के सवालों से पिंड छुड़ा लें। मसलन यह पूछना बेकार है कि क्या यह वोटर को रिझाने की तरकीब है? बीजेपी सरकार ने किसान को साल में 6000 रुपए की घोषणा की। जवाब में कांग्रेस हर गरीब परिवार को महीने में 6000 का वादा कर रही है। वोटर को रिझाने की इस राजनीतिक होड़ में अगर गरीब को कुछ फायदा होता है तो लोकतंत्र की जय हो!

कुछ लोग ऐसे फिजूल सवाल पूछ रहे हैं कि क्या इससे गरीब कामचोर हो जाएंगे? गरीब के लिए कुछ भी किया जाता है, तो ऐसे कुतर्क पेश किए जाते हैं, मानो गरीब अपनी ज़िंदगी बेहतर नहीं करना चाहता। इसी मानसिकता से यह सवाल भी पूछा जाता है कि क्या देश इस बोझ को बर्दाश्त कर सकता है? यह सवाल तब नहीं पूछा जाता जब मोटी तनख्वाह पाने वाले सरकारी कर्मचारियों का वेतन और बढ़ाने के लिए हर साल एक लाख करोड़ रूपया खर्च किया जाता है। तब नहीं उठता जब बड़ी कंपनियों का लोन माफ करने और उन्हें गलत लोन देने वाले बैंकों को बचाने के लिए लाखों करोड़ों रुपए डूबा दिए जाते हैं। देश पर बोझ की चिंता तब नहीं सताती जब केंद्र सरकार के सालाना बजट में अमीरों को तीन लाख करोड़ रुपए की टैक्स छूट दी जाती है। 

सवाल पूछने चाहिए, लेकिन सही तरह के सवाल। क्या इससे देश को फायदा कम और नुकसान ज्यादा होगा? कम से कम पहली नज़र में तो ऐसा नहीं लगता। गरीबों को या देश के सभी नागरिकों को एक न्यूनतम आय सीधे उपलब्ध करवाने का विचार पिछले कई वर्षों में दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों में गहन चर्चा का विषय रहा है। दुनिया में इसे ‘यूनिवर्सल बेसिक इनकम’ के नाम से जाना जाता है। मोदी सरकार के अपने मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने सरकार के 2016 के आर्थिक सर्वे में इसकी सिफारिश की थी। प्रणब बर्धन सरीखे नामी-गिरामी अर्थशास्त्री इसकी वकालत कर चुके हैं। याद रहे कि कांग्रेस का प्रस्ताव सही मायने में यूनिवर्सल बेसिक इनकम नहीं है, क्योंकि इसका लाभ सिर्फ चुनिंदा गरीब परिवारों को ही दिया जाएगा। पक्ष-विपक्ष में तर्क हो सकते हैं, लेकिन इसे नोटबंदी जैसी तुगलकी योजना मानकर खारिज नहीं किया जा सकता।

यह सवाल भी पूछना चाहिए कि यह सुनिश्चित कैसे किया जाएगा कि इसका लाभ सचमुच गरीब परिवार को मिले? यह असंभव नहीं है, लेकिन एक गंभीर चुनौती है। गरीबी उन्मूलन की सभी योजनाओं का अनुभव यही सिखाता है कि गरीबों के चयन में काफी स्थानीय हेरा-फेरी और घपलेबाजी होती है। बहस दरअसल दो बड़े सवालों पर होनी चाहिए, जिनका ब्योरा देने से कांग्रेस कतरा रही है। एक तो यह कि क्या यह योजना गरीबों के लिए चल रही अन्य योजनाओं के पर कतरकर होगी? कई अर्थशास्त्रियों को डर है कि गरीबों के लिए सस्ते राशन, मिड डे मील, मनरेगा और आंगनवाड़ी जैसी योजना को खत्म करने की तैयारी चल रही है और इस नई योजना के बहाने इन सब पुरानी योजनाओं का गला घोट दिया जाएगा। इस सवाल पर कांग्रेस को खुलकर बोलना होगा। दूसरा वाजिब सवाल यह है कि इस योजना के लिए अतिरिक्त फंड कहां से आएगा? क्या कांग्रेस के अनुसार इसके लिए जरूरी 3.6 लाख करोड़ रुपए का सारा केंद्रीय बजट से आएगा या उसमें राज्य सरकारें भी योगदान देंगी? अगर राज्य सरकारें हिस्सा देंगी तो क्या उनके पास इसके लिए संसाधन हैं? और अगर सारा खर्च केंद्र सरकार करेगी, जो उचित भी है, तो इसे सरकार के वर्तमान बजट में से कैसे दिया जा सकेगा? ईमानदारी का तकाजा है कि कांग्रेस यह बताए कि वह संसाधन कहां से जुटाएगी? दुनिया के तमाम पूंजीवादी देशों में भी संपत्ति और उत्तराधिकार पर टैक्स लगता है लेकिन, समाजवादी होने का दावा करने के बावजूद हमारे देश में अमीरों से टैक्स लेने में कंजूसी की जाती है। क्या हमारे देश में 100 करोड़ से अधिक संपत्ति रखने वालों पर हर साल सिर्फ 1 प्रतिशत संपत्ति कर नहीं लग सकता? क्या 100 करोड़ से अधिक संपत्ति उत्तराधिकार में लेते वक्त एक बार 20 प्रतिशत उत्तराधिकार टैक्स नहीं लग सकता? क्या कांग्रेस कंपनियों को दी जाने वाली टैक्स छूट में कटौती करने की हिम्मत दिखाएगी? इन सवालों पर ईमानदार बहस किए बिना कांग्रेस गरीबी के नाम पर छलावे के आरोप से मुक्त नहीं हो सकती।

एक आखिरी बात। इस प्रस्ताव पर बहस इसलिए भी होनी चाहिए ताकि चुनाव वापस पटरी पर आए। पुलवामा के बाद सर्जिकल हमले में कितने आतंकी मारे गए की फिजूल बहस करने से कहीं बेहतर है कि हम इन सवालों पर बहस करें कि देश में गरीबी क्यों है और कैसे मिट सकती है? कौन चौकीदार है और उसके कितने वफादार हैं, इस बहस में गिरने की बजाय यह आकलन लगाएं कि देश की तिजोरी में गरीबों के लिए कितना पैसा है और उसका सबसे बेहतर इस्तेमाल क्या हो सकता है। नेताओं की लोकप्रियता, पार्टियों की सीटों और चैनलों की टीआरपी का हिसाब लगाने की बजाय पार्टियों से हिसाब मांगे, जवाब मांगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

 

First published in the Bhaskar

AUTHOR: YOGENDRA YADAV
National President of Swaraj India

yogendra.yadav@gmail.com

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