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म्यांमार के रोहिंग्या संकट पर स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजीव ध्यानी के लम्बे लेख की पाँचवीं किश्त

म्यांमार के रोहिंग्या संकट पर स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजीव ध्यानी के लम्बे लेख की पाँचवीं किश्त

बेघर और बेचारे लोग-5

रोहिंग्याओं के खिलाफ बर्मा यानी म्यांमार की सेना तथा स्थानीय लोगों के ताजातरीन हमले के पीछे दरअसल अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (ARSA) नाम का एक सशस्त्र मिलिटेंट संगठन था. अभी हाल तक इसे ‘हरकत अल यक़ीन’ के नाम से जाना जाता था. लेकिन इस नाम से इसका इस्लामी धार्मिक उद्देश्य ज्यादा दिखता था,राजनैतिक कम. इसलिए इसका नाम बदलकर इसमें अराकान और रोहिंग्या शब्द जोड़े गए. इस संगठन का प्रमुख अताउल्लाह पाकिस्तान में जन्मा और फिलहाल सऊदी अरब में रहने वाला हुआ एक रोहिंग्या है. इस ग्रुप का उस्ताद और मास्टरमाइंड अब्दुस कुद्दूस बर्मी भी पाकिस्तान में बसा हुआ रोहिंग्या है. यह व्यक्ति अक्सर इस तथाकथित आर्मी के वीडियो संदेशों में दिखाई देता है, और लश्कर –ए- तोइबा प्रमुख हाफ़िज़ सईद के साथ उसके गहरे सम्बन्ध माने जाते हैं. इस आर्मी का स्थानीय मुखिया ‘शरीफ’ के नाम से जाना जाता है. कहा जाता है कि वह रखाइन और बांग्लादेश बॉर्डर पर सक्रिय रहता है. इसे ज्यादा लोगों ने देखा नहीं है. उसे रोहिंग्या बताया जाता है, लेकिन उसकी ज़बान और लहज़ा पाकिस्तानी उर्दू का है. हो सकता है कि यह व्यक्ति भी पाकिस्तान में जन्मा या बसा हुआ रोहिंग्या हो. बांग्लादेश के अलावा बहुत से रोहिंग्या भारत, पाकिस्तान, खाड़ी के देशों, मलेशिया वगैरह में भी बसे हैं.

बाहरी हाथ

बर्मा की राज्यसत्ता द्वारा रोहिंग्याओं पर हुए अत्याचारों ने दुनिया भर में बहुत से गैर रोहिंग्या अतिवादी संगठनों को भी ARSA के साथ ला खडा किया है. पहले रोहिंग्या मिलिटेंट संगठन पुरानी बंदूकों से और स्थानीय फंडिंग से काम चलाते थे, लेकिन अब उनके लिए हथियारों और पैसे की कमी नहीं. ख़बरें तो यह भी हैं कि ARSA में बहुत से विदेशी मिलिटेंट्स भी काम करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की मानें तो बांग्लादेशी लड़कों के अलावा इस तथाकथित आर्मी में 40 के करीब पाकिस्तानी भी शामिल हैं. बीते कुछ समय में कुछ उज़बेक, अरब और अफगान आतंकी भी इनसे जुड़ गए हैं. म्यांमार में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के बाद ये लोग बांग्लादेश की सरहद में आ जाते हैं, और पहले से बांग्लादेश में रह रहे 2 लाख रोहिंग्या लोगों के बीच आसानी से छुप जाते हैं.

यह संगठन दुनिया भर में सक्रिय तमाम आतंकवादी संगठनों से अलग तरीके से काम करता है. इसके काम करने का तरीका भारत और नेपाल के माओवादी संगठनों की तरह है. इसमें हथियारबंद प्रशिक्षित लड़ाकों के अलावा स्थानीय लोग भी सक्रिय रहते हैं, और बड़ी संख्या में लोग इकठ्ठा होकर बंदूकों के अलावा लाठियों और धारदार हथियार लेकर भी हमला करते हैं. इसी तरीके से 2016 के अक्टूबर महीने में म्यांमार के बॉर्डर गार्ड्स की कई पोस्ट्स पर हरकत अल यक़ीन यानी अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी के मिलिटेंट्स तथा स्थानीय लोगों ने हमला किया, जिसमें सुरक्षाबलों के 9 जवान मारे गए. म्यांमार की सेना और सरकार तो इस तरह की घटनाओं के इंतज़ार में ही रहती हैं. जवाबी कार्रवाई में सेना ने हत्याओं, बलात्कारों और गाँवों को जलाने का अभियान शुरू कर दिया. इस बार भी करीब 25 हज़ार लोग बांग्लादेश की ओर भागे.

बौद्ध भिक्षु बना नफरत का प्रचारक

वैसे तो रोहिंग्याओं और बर्मी बौद्धों के बीच तनाव का एक लंबा इतिहास रहा है, लेकिन हाल के दशकों में इसने बेहद हिंसक रूप ले लिया. आश्चर्यजनक रूप से म्यांमार की सरकार और बहुसंख्यक बौद्ध जनता को रोहिंग्याओं के खिलाफ खडा करने में एक बौद्ध भिक्षु का बड़ा हाथ रहा है. अशिन विराथू नाम का यह बौद्ध भिक्षु पिछले लगभग एक दशक में बड़ी तेज़ी से उभरा. बौद्ध धर्म को मजबूत करने के बहाने शुरू हुआ उसका उग्रराष्ट्रवादी अभियान अंततोगत्वा मुस्लिम विरोधी अभियान साबित हुआ. पिछले कुछ सालों में उसने छोटी- छोटी सभाओं के ज़रिये बर्मा के नौजवानों को रोहिंग्या और दूसरे मुसलमानों के खिलाफ एकजुट किया है. विराथू और उस जैसे तमाम लोग म्यांमार के एक आम बौद्ध व्यक्ति को यह समझाने में कामयाब रहे हैं कि किस तरह रोहिंग्याओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, और अगर उन्हें रोका नहीं गया तो एक दिन वे रखाइन प्रांत पर और फिर समूचे म्यांमार पर कब्जा कर लेंगे. इस तरह के प्रचार में यह तथ्य भी मदद करता है कि म्यांमार में आधिकारिक तौर पर कोई जनगणना का कोई आंकडा मौजूद नहीं है. पिछले करीब पचास साल तक वहाँ सैन्य शासन लगा रहा, और म्यांमार में विभिन्न एथनिक समूहों द्वारा चलाए जा रहे अलगाववादी आन्दोलनों के मद्देनज़र सेना ने शायद जानबूझ कर जनगणना नहीं करवाई.

विराथू लोगों को इतिहास के हवाले से यह भी बताता है कि किस तरह म्यांमार की आज़ादी के बाद रोहिंग्याओं ने अलग देश में रहने या पाकिस्तान के साथ जाने की मांग की थी. हालाँकि जहां तक रोहिंग्याओं की जनसंख्या वृद्धि की बात है, हार्वर्ड विश्व विद्यालय के एक अध्ययन ने इस बात को बेबुनियाद बताया है कि रोहिंग्याओं की आबादी असामान्य रूप से बढ़ रही है. वैसे रोहिंग्या शरणार्थियों के बीच काम कर रहे बांग्लादेशी मुस्लिम भी मानते हैं कि रोहिंग्याओं में प्रजनन दर असामान्य रूप से बहुत ज्यादा है. याद रहे कि बांग्लादेश का परिवार नियोजन कार्यक्रम अपने आप में एक मिसाल है.

बहरहाल, विराथू के इन सब तर्कों को मानते हुए खासकर रखाइन प्रांत के बहुत से बौद्धों ने रोहिंग्याओं का आर्थिक बहिष्कार कर रखा है. वे ऐसा कुछ भी करने से बचते हैं, जिससे किसी भी रोहिंग्या को आर्थिक लाभ हो.

विराथू एक प्रभावी वक्ता है, और मुसलमानों के खिलाफ आग उगलने वाले उसके वीडियोज़ बर्मी बौद्ध युवकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं. पिछले करीब एक साल से म्यांमार सरकार ने अशिन विराथू की सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबन्ध लगा रखा है, लेकिन अब वह फेसबुक के ज़रिये अपने समर्थकों से संवाद स्थापित करता है.

सोशल मीडिया बना माध्यम

आज की तारीख में म्यांमार में लगभग तीन करोड़ लोग फेसबुक पर हैं, जबकि तीन साल पहले यानी 2014 में यह संख्या सिर्फ 20 लाख थी. दरअसल पूर्ववर्ती सैन्य सरकार ने मोबाइल और इंटरनेट के इस्तेमाल को देश में ज्यादा बढ़ने नहीं दिया. इसकी कीमतें इतनी ज्यादा रखी गईं कि कोई आम बर्मी नागरिक इनका इस्तेमाल करने के बारे में सोच भी नहीं सकता था. लेकिन लोकतंत्र की शुरुआत के साथ इंटरनेट की पहुँच बढी. लेकिन एक विचित्र तथ्य यह है कि फेसबुक के अलावा इन्टरनेट का इस्तेमाल म्यांमार में न के बराबर है. लोग तो अतिशयोक्ति में यहाँ तक कहते हैं कि म्यांमार में इंटरनेट का मतलब है फेसबुक और फेसबुक का मतलब है अशिन विराथू.

जल उठा रखाइन

बहरहाल, सितम्बर 2012 में अशिन विराथू ने बर्मा के प्रमुख शहर मांडले में एक बड़ी रैली आयोजित की. रैली का मकसद था, राष्ट्रपति थिएन सेन की उस कथित योजना का समर्थन करना, जिसके तहत योजनाबद्ध तरीके से रोहिंग्याओं को रखाइन प्रांत और म्यांमार की धरती से बेदखल किया जाना था. इस रैली के बाद समूचे म्यांमार खासकर रखाइन प्रांत का माहौल गरमा गया. ज़रुरत बस एक छोटी सी चिंगारी की थी, और यह चिंगारी निकली मेक्तिला शहर के एक सुनार की दूकान से. अक्टूबर 2012 में सुनार की दूकान में हुए छोटे से विवाद ने सारे रखाइन प्रांत में आग लगा दी.

इसके बाद भी रखाइन प्रांत में हिंसा की छिटपुट घटनाएँ जारी रहीं. अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी के आतंकी भी लगातार कुछ न कुछ करते ही रहे.

….अगली किश्त में जारी….

Photo credit: PTI


लेखक: राजीव ध्यानी
स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
राजीव ध्यानी पेशे से संचार सलाहकार और प्रशिक्षक हैं. लम्बे समय तक उन्होंने यूनिसेफ, केयर तथा बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट जैसी संस्थाओं के साथ कार्य किया है.

rajeevdhyani@gmail.com

लेखक के विचार निजी हैं.