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म्यांमार के रोहिंग्या संकट पर स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजीव ध्यानी के लम्बे लेख की सातवीं किश्त


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बेघर और बेचारे लोग-7

बहरहाल 25 अगस्त 17 से लेकर यह लेख लिखे जाने तक साढ़े छः लाख से ज्यादा नए रोहिंग्या बांग्लादेश में आ चुके थे, जबकि लगभग सवा दो लाख हज़ार शरणार्थी पहले से ही बांग्लादेश में थे. बांग्लादेश में हज़ारों निर्जन और कम आबादी वाले द्वीप हैं. मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक़ पहले सरकार ने पहले यह मन बनाया कि रोहिंग्याओं को इन द्वीपों में बसाया जाएया, लेकिन बाद में इन्हें म्यांमार सीमा से लगे कॉक्स बाज़ार जिले के ऊखिया तथा टेकनाफ उपज़िलों में बसाने का फैसला हुआ. लेख लिखे जाने तक शरणार्थियों को अस्थाई तौर पर बसाने के लिए काफी बड़ी जगह तय की गई है. संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की मदद से इन ज़मीनों पर शरणार्थियों की अस्थायी बस्तियां बना रही है.

अनियोजित बस्तियां

यह दीगर बात है कि बड़ी संख्या में लोगों ने सरकार द्वारा निर्धारित जगहों के आसपास की जगहों पर भी बसना शुरू कर दिया. देखते ही देखते उखिया और टेकनाफ के जंगलों के बीच सरकारी शरणार्थी बस्तियों के अलावा कई अन्य बस्तियां भी उभर आईं. संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं तथा सरकार ने एक तरह से इन्हें भी मान्यता दे दी. अगस्त 17 के बाद म्यांमार से बांग्लादेश आए लगभग साढ़े छः लाख लोगों में से करीब एक लाख अस्सी हज़ार लोग इस तरह की अनियोजित बस्तियों में रह रहे थे.

शुरूआती राहत

सबसे ज़रूरी थी खाने की व्यवस्था. शुरुआत में सरकार ने शरणार्थियों के लिए बने- बनाए भोजन की व्यवस्था की. कुछ स्थानीय लोग भी मदद के लिए आने लगे. कुछ स्थानीय संस्थाओं ने भी खाने की सामग्री बांटी और लंगर चलाए. कुछ लोगों ने नक़दी बांटना भी शुरू किया. इसके बाद तो सरकार, संयुक्त राष्ट्र की तमाम संस्थाएं, अंतर्राष्ट्रीय एन जी ओ तथा बांग्लादेश और दुनिया के तमाम कोने से आनेवाले स्वयंसेवकों का तांता लग गया. भारत सरकार की ओर से भी बड़ी मात्रा में खाद्य रसद, दवाएं और दूसरी ज़रूरी सामग्री भेजी गई. कपडे तो इतने बांटे गए कि शरणार्थियों ने अच्छे कपडे रखकर बाकी सड़कों के किनारे फेंक दिए. जल्दबाजी में कुछ संस्थाओं ने कामचलाऊ शौचालय बनवा दिए थे, जो जल्द ही भर गए और बजबजाने लगे. एक ही बस्ती में कई- कई संस्थाओं ने बाकायदे अपने बोर्ड और झंडे लगा दिए. इसे लेकर कई जगह संस्थाओं में आपसी तनातनी भी शुरू हो गई.

यहाँ भी कफ़नखसोट

लेकिन यह सब अव्यवस्थित रूप से हो रहा था. कुछ लोग इसमें भी गड़बड़ करने से बाज नहीं आ रहे थे. जिसे जहां जितनी जगह मिली उसने उसमें अपना ठिकाना बना लिया. चालाक और तेज़ लोग एक बार से ज़्यादा सामग्री पा जाते थे. बेसहारा बच्चे, बूढ़े, बीमार और महिलाएं अक्सर इससे वंचित रह जा रहे थे. चूँकि रोहिंग्या शरणार्थियों में पढ़े- लिखे लोग कम हैं, इसलिए शरणार्थियों ने खुद ही कुछ पढ़े- लिखे युवकों को अपने मुखिया यानी ‘माझी’ के तौर पर तय कर दिया. शरणार्थी शिविरों में कार्यरत संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य संस्थाओं ने भी सुविधा के लिए इन्हें काफी हद तक मान्यता दे दी. एक तरह से ये लोग रोहिंग्या और गैर रोहिंग्या के बीच के सेतु हैं. ज़ाहिर हैं कि इनमें से कुछ बाहरी मदद में से अपना बड़ा हिस्सा चाहेंगे.

संयुक्त राष्ट्र ने संभाली कमान

लेकिन संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा कमान संभाल लेने के बाद शरणार्थी राहत का कार्य व्यवस्थित रूप से होने लगा. पहले एक ही जगह पर कई संस्थाएं सामग्री का वितरण कर देती थीं, लेकिन अब सबकुछ समन्वित रूप में हो रहा था. स्वयंसेवक पहले बस्तियों में गए और राशन कार्ड जैसे कार्ड बाँट कर आ गए. इसके बाद निर्धारित तारीख को लोग वितरण केन्द्रों तक पहुंचे, और पर्चियाँ दिखाकर राशन तथा दूसरी ज़रूरी चीज़ें प्राप्त करते गए. सरकारी विभागों, सेना, स्थानीय संस्थाओं तथा स्वयंसेवकों के सहयोग से बहुत व्यवस्थित रूप से दाल- चावल, नमक, चीनी, सूखा दूध पाउडर, पानी रखने के लिए बाल्टियां, क्लोरीन की गोलियों आदि का वितरण होने लगा. रास्ते बनाने और ज़मीन समतल करने के लिए के लिए कुछ- कुछ परिवारों के बीच के बीच एक सेट फावड़े और दूसरे औजारों का दिया गया. कामचलाऊ घर बनाने के लिए सभी परिवारों को बांस और तारपोलिन/ प्लास्टिक की चादरें, प्लास्टिक की रस्सियाँ आदि दी गईं.

व्यवस्थित और नियोजित प्रयास

अक्टूबर आते- आते यह स्थिति बन गई कि कोई भी राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय संस्था अपनी मर्जी से किसी इलाके में काम नहीं कर सकती थी. इसके बाद आवश्यकता और प्राथमिकता के अनुसार संस्थाओं के बीच कार्य का आवंटन होने लगा. इसके बाद व्यवस्थित रूप से दीर्घकालिक योजनाएं भी बनने लगीं. अस्थाई अस्पताल बने, बच्चों के लिए स्कूल और खेलने की जगहें बननी शुरू हुई. लाखों लोगों को मनोवैज्ञानिक सलाह की ज़रुरत थी, सो काउंसलिंग शुरू हुई. अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के टाउन प्लानर और आर्किटेक्ट आए. उन्होंने योजनाबद्ध ढंग से तरीके से बस्तियां बसाने के लिए सुझाव दिए, और इन पर काम भी शुरू हो गया. नए आवास सही जगहों पर ज्यादा मजबूती के साथ बनाए गए; हैण्ड पम्प सही गहराई पर खोदे गए, और शौचालय सही जगहों पर बने. कुछ संस्थाओं ने बेहतर तरीके से काम करते हुए सड़कों पर सौर ऊर्जा से चलने वाले बल्ब भी लगाए. फ्रांस में हुए वन अर्थ समिट में प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के बयान के मुताबिक़ बांग्लादेश सरकार ने शिविरों के लिए बालूखाली- कुटुपलांग इलाके की करीब 1800 हेक्टेयर ज़मीन भी निर्धारित कर दी है. इन शिविरों तक लोगों की सुगम आवाजाही के लिए बांग्लादेश की सेना की निर्माण इकाई लगभग 20 किलोमीटर की सड़कें भी बना रही है.

(अ)शान्ति का नोबेल पुरस्कार

इस समूचे प्रकरण में सबसे निंदनीय भूमिका म्यांमार की प्रीमियर आन सान सू क्यी की रही. यह अलग बात है कि म्यांमार में कुछ हद तक लोकतंत्र लागू हो जाने के बावजूद चलती तो वहाँ सेना की ही है. वहाँ की संसद में सेना के प्रतिनिधियों के लिए बाकायदा एक चौथाई सीटें आरक्षित हैं. वहाँ रक्षा, गृह और सीमा से सम्बंधित विभाग सीधे सेना के नियंत्रण में हैं. लेकिन शान्ति के लिए नोबेल पुरूस्कार पाने वाली सू क्यी को कम से कम चुप तो नहीं रहना चाहिए. अगस्त 17 में रखाइन प्रांत में रोहिंग्याओं के साथ जो कुछ हुआ, उससे लगता तो यही है कि सेना की कार्रवाई को सू क्यी समेत सभी पूरी सरकार और देश के बहुसंख्यक बौद्धों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन था.

….अगली किश्त में जारी….

Photo credit: Amy Southall / Talk Radio


लेखक: राजीव ध्यानी
स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
राजीव ध्यानी पेशे से संचार सलाहकार और प्रशिक्षक हैं. लम्बे समय तक उन्होंने यूनिसेफ, केयर तथा बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट जैसी संस्थाओं के साथ कार्य किया है.

rajeevdhyani@gmail.com

लेखक के विचार निजी हैं.