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म्यांमार के रोहिंग्या संकट पर स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजीव ध्यानी के लम्बे लेख की छठवीं किश्त



बेघर और बेचारे लोग-6

अक्टूबर 2016 में बंगलादेश सीमा के निकट म्यांमार की तीन सीमा चौकियों पर आतंकियों ने बड़ी संख्या में इकठ्ठे होकर हमले किए, और बड़ी मात्रा में हथियार और गोला- बारूद लूट ले गए. इस तरह के हमले कई दिनों तक जारी रहे. जवाब में म्यांमार सेना ने अपना पुराना हथियार चला. आतंकी तो अक्सर उनके हाथ आते नहीं थे, सो उन्होंने आम रोहिंग्या नागरिकों का दमन करना शुरू कर दिया. 400 से ज्यादा लोगों को आतंकवादियों की मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया. समाचार एजेंसी रायटर्स के मुताबिक़ इनमें से 13 तो बच्चे थे. एक की उम्र तो सिर्फ 10 साल थी. जबकि सबसे उम्रदराज़ व्यक्ति 75 वर्ष का था. एकबार फिर बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोग भागकर बांग्लादेश आ पहुंचे.

25 अगस्त 2017 के हमले

इसके बाद भीतर- भीतर आतंकी तैयारियां चलती रहीं. म्यांमार सेना के दमन ने भी आग में घी डालने का काम किया. 25 अगस्त 2017 को बड़ी संख्या में अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी के आतंकियों ने एक के बाद एक पुलिस चौकियों और सेना के शिविर पर हमले किए. अत्याधुनिक हथियारों के अलावा देसी बमों, तलवारों और लाठियों से लैस बड़ी भीड़ ने पुलिस की तीस चौकियों और सेना के एक शिविर को जला डाला. इसमें 11 पुलिसकर्मी, एक सैनिक और एक इमिग्रेशन अधिकारी मारे गए. कई पुलों को तोड़ डाला गया. म्यांमार सरकार इस आक्रमण में शामिल लोगों की संख्या एक हज़ार बताती है. तथाकथित आतंकी आर्मी ने भी सैकड़ों लोगों के भर्ती होने की तस्दीक की. इसके इसके बाद आतंकियों ने एक हिन्दू बस्ती से सौ से अधिक ग्रामीणों को अगवा कर लिया.

पुलिस की चौकियों को जलाते और पुलिसवालों की हत्या करते समय अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी के आतंकियों को शायद यह एहसास तक न रहा हो कि वे अपने लोगों के लिए कितना बड़ा संकट खडा करने जा रहे हैं. यह शायद बर्मा में रोहिंग्याओं के इतिहास की सबसे बड़ी भूल थी. सेना को तो मानो मनचाही मुराद मिल गई थी. कुछ साल पहले आए कमज़ोर लोकतंत्र के बावजूद दशकों तक बर्मा पर राज करने वाली सेना अब निर्वाचित शासकों के रोके भी रुकने वाली नहीं थी. लेकिन दुखद बात यह थी कि लोकतांत्रिक सरकार की ओर से ऐसा कोई प्रयास हुआ भी नहीं.

सुनियोजित दरिंदगी

इसके बाद तो हिंसा का ऐसा दौर शुरू हुआ, जिसका वर्णन करते भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं. म्यांमार सेना के तथाकथित क्लीयरेंस ऑपरेशन के तहत रोहिंग्या आबादी वाले लगभग 288 गाँवों को पूरी तरह से आग के हवाले कर दिया गया. आगज़नी इतनी भीषण थी कि हफ़्तों तक अंतरिक्ष से लिए गए सेटेलाइट चित्रों में भी ये आग और धुआँ दिखता रहा. सेना के लोगों ने लड़कों और पुरुषों को पंक्ति में खडा करके गोली मारी. सितम्बर की शुरुआत में सेना ने बताया कि कुल 400 लोग मारे गए हैं, और उनमें से ज़्यादातर आतंकी थे, लेकिन वास्तविक संख्या हज़ारों तक जाती है. दिसंबर 17 में डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स नामक अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संगठन ने हत्याओं की संख्याओं के बारे में अनुमान जारी किए. उनके मुताबिक़ यह संख्या लगभग 7000 हो सकती है, लेकिन शरणार्थियों की मानें तो यह संख्या इससे कई गुना है.

सेना और स्थानीय लोगों ने रोहिंग्याओं के घरों में आग लगाईं और माँओं के सीने से लगे दुधमुंहे बच्चों को उस आग में ज़िंदा झोंक दिया. पिताओं के सामने बेटियों से, और भाइयों के सामने बहनों से बलात्कार किये गए. 13 साल की एक बच्ची से तो म्यांमार सेना के दस दरिंदों ने बलात्कार किया. मासूम बच्चियों से लेकर अधेड़ औरतों तक, हैवानों ने किसी महिला को नहीं बख्शा. देखने-भालने में अच्छी कुछ महिलाओं की ज़िंदगी इसलिए बख्श दी गई कि आगे भी उनका शारीरिक दोहन किया जा सके.

जब शुरुआती गाँव जले, तो बाकी गाँवों के बहुत से लोगों को बचकर भागने का समय मिल गया. लोग जो हाथ आया, उसे लेकर निकल भागने की तैयारी करने लगे. बांग्लादेश की सीमा के पास वाले गाँवों से लोग तुरंत सीमा की ओर रवाना हुए, जबकि दूसरे कई जंगलों में जा छुपे. फौजियों के लौट जाने के बाद ये लोग भी वापस गाँवों में आए. मृतकों के शवों को जैसे तैसे निपटाया गया. कुछ शव ऐसे ही पड़े रह गए होंगे. जले हुए घरों में जो कुछ बचा था, और जितना माल- असबाब समेटा जा सकता था, इसे बटोर कर सभी चल दिए अनिश्चितता और आशंकाओं से भारी यात्रा पर.

दिशा सबकी एक ही थी. उनके पुरखों की ज़मीन. पुराना बंगाल, और आज का बांग्लादेश.

बच्चे माँओं की गोदियों में आए, जबकि बूढ़े और बीमार जवानों की पीठ पर लादकर लाए गए. हज़ारों की तादाद में गर्भवती महिलाएं मीलों-मील पैदल चलीं. कइयों को रास्ते में ही प्रसव वेदना होने लगीं, और चादरों की ओट में दूसरी महिलाओं ने रास्तों, जंगलों और नावों पर उनके प्रसव कराए. कुछ बूढ़े और बीमार बीच यात्रा में ही चल बसे. उन्हें रास्तों में ही सुपुर्दे ख़ाक किया गया, और कारवां बांग्लादेश सीमा की ओर बढ़ता चला गया.

उधर बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड्स ने नाफ नदी पार करके बांग्लादेश की सीमा में दाखिल हो रहे रोहिंग्याओं को रोकना शुरू कर दिया. देखते ही देखते बांग्लादेश की सीमा और नो मैन्स लैंड में हज़ारों रोहिंग्या इकठ्ठे हो गए.

धर्मसंकट में शेख हसीना

भारत की तरह बांग्लादेश ने भी 1951 के संयुक्त राष्ट्र रिफ्यूजी कन्वेंशन पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. इसका मतलब है कि बांग्लादेश इन्हें शरण देने के लिए बाध्य नहीं था. म्यांमार के हालात को देखते हुए बांग्लादेश की सरकार यह अच्छे से जानती थी, कि एक बार बांग्लादेश आ जाने के बाद रोहिंग्याओं को वापस भेजना लगभग असंभव हो जाएगा. एक साथ इतनी बड़ी आबादी के भरण- पोषण की व्यवस्था करना भी बांग्लादेश जैसे ग़रीब देश के लिए कोई आसान काम नहीं था. पहले ही बांग्लादेश में अधिकृत रूप से 2 लाख से अधिक रोहिंग्या रह रहे थे.

शेख हसीना की सरकार को डर यह भी था कि आम रोहिंग्या शरणार्थियों के बीच कट्टरपंथी और आतंकी तत्व भी बांग्लादेश की ज़मीन पर आ जाएंगे. म्यांमार की सेना और सरकार की दरिंदगी ने पहले ही एक आम रोहिंग्या युवक के हथियार थाम लेने की ज़मीन तैयार कर रखी है. भाषा तथा संस्कृति की समानता के चलते रोहिंग्या आसानी से पहले चटगाँव इलाके के स्थानीय लोगों और फिर बाक़ी बांग्लादेश में आसानी से घुल-मिल सकते हैं. ऐसे में शेख हसीना की सरकार अपने लिए यह आफत मोल लेना नहीं चाहती थी.

बाहरी और भीतरी दबाव

लेकिन बांग्लादेश के लोग, ख़ासकर कट्टरपंथी दल और जमातें सरकार के खिलाफ माहौल बनाने लगीं. बांग्लादेशी मीडिया लगातार म्यांमार सीमा से रिपोर्टिंग कर रहा था. जल्द ही इसमें अंतर्राष्ट्रीय मीडिया भी शामिल हो गया. मानव अधिकार संगठन और एक समय में बांग्लादेश में समानांतर सत्ता चलाने वाले एन जी ओ भी जोर डालने लगे. धीरे- धीरे अंतराराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ रहा था. बांग्लादेश के बाद रोहिंग्याओं के लिए दूसरा विकल्प था भारत. लेकिन अपने हज़ारों सालों के इतिहास में हर शरणागत को आश्रय देने वाला भारत इस बार मुकर गया. रोहिंग्या मुद्दे पर भारत के मीडिया में बना माहौल भी शेख हसीना के खिलाफ जा रहा था. डेढ़ साल बाद बांग्लादेश में चुनाव भी होने थे. चुनाव के समय यह मुद्दा शेख हसीना के नेतृत्व वाली आवामी लीग के लिए भारी पड़ सकता था. शेख हसीना को शायद पहली बार समझ में आया कि धर्मसंकट शब्द के असल मायने क्या होते हैं.

ज़रूरी थी एहतियात

आखिरकार भीतरी और बाहरी दबावों के चलते सरकार को यह मुश्किल फैसला लेना पड़ा. हालाँकि ऐसा करने के साथ ही सरकार ने यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश की कि रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश की बाकी आबादी में मिल न जाएं. इसके लिए हर शरणार्थी का बायो मैट्रिक रजिस्ट्रेशन कराया गया.

पंजीकरण के बाद रोते- बिलखते इन शरणार्थियों को ट्रकों में भरकर सुरक्षाबलों की निगरानी में शरणार्थी शिविरों की ओर ले जाया गया. एक बार शिविर क्षेत्र में पहुँच जाने के बाद शरणार्थी को दूसरे इलाकों की ओर जाने नहीं दिया जाता. शिविरों की ओर जाने वाले सभी रास्तों पर सुरक्षाबल तैनात किए गए. शिविरों की ओर से आने वाली हर छोटी- बड़ी गाड़ी की जाँच की जाने लगी, ताकि कोई रोहिंग्या शिविर से निकल कर बांग्लादेश के दूसरे हिस्सों में दाखिल न हो जाए.

….अगली किश्त में जारी….

Photo credit: India Today


लेखक: राजीव ध्यानी
स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
राजीव ध्यानी पेशे से संचार सलाहकार और प्रशिक्षक हैं. लम्बे समय तक उन्होंने यूनिसेफ, केयर तथा बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट जैसी संस्थाओं के साथ कार्य किया है. 

rajeevdhyani@gmail.com

लेखक के विचार निजी हैं.